Tuesday, March 31, 2026

The प्रोफेसर साहब - पुस्तक समीक्षा

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#समीक्षा 
पुस्तक - The प्रोफेसर साहब
लेखिका - श्रीयांशी चौबे Shreeyanshi Choubey 
प्रकाशक - flydreams publication FlyDreams Publications 
मूल्य - ₹249/- (पुस्तक पर अंकित)
पृष्ठ - 174
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हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कोई एक ऐसा शख्श जरूर आता है, जिसके व्यतित्व से वह अपने आसपास के अधिकतर लोगों को प्रभावित कर लेता है। वैसे तो यह गुण कुछ लोगों में जन्मजात होते हैं और कुछ इसके अलग-अलग कोर्स, वर्कशॉप इत्यादि से रोजाना अभ्यास से खुद को बेहतर बनाते चले जाते हैं। ऐसे अधिकतर लोग आगे चलकर मोटिवेशनल स्पीकर इत्यादि का कार्य करते हैं। वैसे यह गुण एक शिक्षक और प्रोफेसर में होना बहुत जरूरी है, वरना आप अपने छात्रों के अंतर्मन से सही से जुड़ नहीं पाएंगे। 
यह पूरी भूमिका पटना की नव- लेखिका ‘श्रीयांशी चौबे’ की प्रथम पुस्तक (उपन्यास) ‘The प्रोफेसर साहब’ के प्रोफेसर राघव (मुख्य पात्र) के गुणों को दर्शाता है। प्रोफेसर साहब अपने ज़िंदादिली, सौम्य और बहिर्मुखी स्वभाव के कारण हर किसी के दिल में उतर जाते हैं। हर किसी को मोटिवेट करने वाले प्रोफेसर साहब पर कहानी की नायिका सृष्टि का दिल आ जाता है। लेकिन उन दोनों के बीच प्रोफेसर और छात्रा वाला संबंध है। पर सृष्टि यहाँ ये भूल जाती है कि प्रोफेसर साहब का एक प्रोफेशनल जीवन के साथ-साथ एक पर्सनल जीवन भी है। जब सृष्टि को प्रोफेसर साहब के पर्सनल जीवन के राज सामने आते हैं, तो वह खुद को ठगा हुआ पाती है। सच्चाई जानने के बाद वह खुद से प्रश्न करती है कि प्रोफेसर साहब के जीवन में हज़ारों छात्र-छात्राएं आये होंगे। और इतने सुलझे व्यक्ति कैसे एक खास के चक्कर में अपना सबकुछ बर्बाद करने की सोच लेंगे।
यह कहानी आपको पटना की उस सच्चाई से रूबरू करवाती हैं, जहाँ आजकल खुद को सफलता हासिल करने कोई कैसे दूसरों के मन और आत्मा के साथ खेल जाता है। यह कहानी आपको यह भी बताती है कि कोई व्यक्ति जीवन में इतना ठगे जाने के बाद भी अपने प्रोफेशनल लाइफ पर उसका असर तक नहीं आने देता है। 
आपको नैत्रि का किरदार शुरू में एकदम समझ में नहीं आएगा, लेकिन कहानी के अंत होते-होते उसकी महत्वकांक्षा आपको उसके असली चेहरे से रूबरू करवा देगा। नैत्रि के किरदार के आने के बाद सृष्टि सिर्फ एक सहयोगी किरदार बनकर रह जाती है।
लेखिका श्रीयांशी चौबे ने अपनी पहली पुस्तक में एक कठिन और संवेदनशील मुद्दे को सबके सामने प्रस्तुत किया है। किताब अच्छी लिखी गयी है। एक बार आप इसे जरूर पढ़ सकते हैं।

समीक्षक - अभिलाष दत्ता

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