Wednesday, April 15, 2026

रैंक - 80 (पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक - रैंक 80
लेखक - गोलू सेन कुंभराजी
प्रकाशक - flydreams publication
पृष्ठ - 164
मूल्य - ₹249/-
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कुछ कहानियाँ संघर्ष और प्रेम को एक साथ लेकर चलती हैं। उसी में से एक है ‘रैंक 80’। लेखक ‘गोलू सेन कुंभराजी’ ने रैंक 80 के माध्यम से यह बताया कि भारत के आज भी कुछ हिस्सों में लड़कियों की शिक्षा बहुत पीछे है। तो कुछ हिस्सों में आज भी साहूकारों के ब्याज के जाल में लोग फंसे हुए हैं। 
पहले अध्याय में संध्या के संघर्ष की भूमिका बांधी गयी है। तो ऐसा प्रतीत होता है कि आगे पूरी कहानी संध्या के दृष्टिकोण से देखने को मिलेगी, लेकिन अगले ही अध्याय में कहानी में रुद्र का आगमन होता है और कहानी संध्या से रुद्र की तरफ खिसक जाता है और संध्या सिर्फ एक सहयोगी पात्र बनकर रह जाती है। यहाँ लेखक ने ऐसा प्रयोग क्यों किया है, ये तो वही बता सकते हैं। कहानी का बैकग्राउंड upsc है। वैसे तो upsc के मुद्दे पर आज से दस-बारह साल पहले कई उपन्यास लिखे गए और उसमें कई हिट भी हुए। इस कारण इस किताब में फिर से आपको दिल्ली के मुखर्जी नगर के दर्शन होंगे। upsc मुद्दे के कारण किताब में दुहरावपन का शिकार होती है। लेकिन अन्य upsc आधीरात उपन्यासों में कॉमेडी का तड़का होता है, वह इसमें गायब है।
किताब अच्छी बनी है, एकबार पढ़ने लायक है।


समीक्षक - अभिलाष दत्ता

Tuesday, March 31, 2026

The प्रोफेसर साहब - पुस्तक समीक्षा

#बातचीत 
#समीक्षा 
पुस्तक - The प्रोफेसर साहब
लेखिका - श्रीयांशी चौबे Shreeyanshi Choubey 
प्रकाशक - flydreams publication FlyDreams Publications 
मूल्य - ₹249/- (पुस्तक पर अंकित)
पृष्ठ - 174
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हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कोई एक ऐसा शख्श जरूर आता है, जिसके व्यतित्व से वह अपने आसपास के अधिकतर लोगों को प्रभावित कर लेता है। वैसे तो यह गुण कुछ लोगों में जन्मजात होते हैं और कुछ इसके अलग-अलग कोर्स, वर्कशॉप इत्यादि से रोजाना अभ्यास से खुद को बेहतर बनाते चले जाते हैं। ऐसे अधिकतर लोग आगे चलकर मोटिवेशनल स्पीकर इत्यादि का कार्य करते हैं। वैसे यह गुण एक शिक्षक और प्रोफेसर में होना बहुत जरूरी है, वरना आप अपने छात्रों के अंतर्मन से सही से जुड़ नहीं पाएंगे। 
यह पूरी भूमिका पटना की नव- लेखिका ‘श्रीयांशी चौबे’ की प्रथम पुस्तक (उपन्यास) ‘The प्रोफेसर साहब’ के प्रोफेसर राघव (मुख्य पात्र) के गुणों को दर्शाता है। प्रोफेसर साहब अपने ज़िंदादिली, सौम्य और बहिर्मुखी स्वभाव के कारण हर किसी के दिल में उतर जाते हैं। हर किसी को मोटिवेट करने वाले प्रोफेसर साहब पर कहानी की नायिका सृष्टि का दिल आ जाता है। लेकिन उन दोनों के बीच प्रोफेसर और छात्रा वाला संबंध है। पर सृष्टि यहाँ ये भूल जाती है कि प्रोफेसर साहब का एक प्रोफेशनल जीवन के साथ-साथ एक पर्सनल जीवन भी है। जब सृष्टि को प्रोफेसर साहब के पर्सनल जीवन के राज सामने आते हैं, तो वह खुद को ठगा हुआ पाती है। सच्चाई जानने के बाद वह खुद से प्रश्न करती है कि प्रोफेसर साहब के जीवन में हज़ारों छात्र-छात्राएं आये होंगे। और इतने सुलझे व्यक्ति कैसे एक खास के चक्कर में अपना सबकुछ बर्बाद करने की सोच लेंगे।
यह कहानी आपको पटना की उस सच्चाई से रूबरू करवाती हैं, जहाँ आजकल खुद को सफलता हासिल करने कोई कैसे दूसरों के मन और आत्मा के साथ खेल जाता है। यह कहानी आपको यह भी बताती है कि कोई व्यक्ति जीवन में इतना ठगे जाने के बाद भी अपने प्रोफेशनल लाइफ पर उसका असर तक नहीं आने देता है। 
आपको नैत्रि का किरदार शुरू में एकदम समझ में नहीं आएगा, लेकिन कहानी के अंत होते-होते उसकी महत्वकांक्षा आपको उसके असली चेहरे से रूबरू करवा देगा। नैत्रि के किरदार के आने के बाद सृष्टि सिर्फ एक सहयोगी किरदार बनकर रह जाती है।
लेखिका श्रीयांशी चौबे ने अपनी पहली पुस्तक में एक कठिन और संवेदनशील मुद्दे को सबके सामने प्रस्तुत किया है। किताब अच्छी लिखी गयी है। एक बार आप इसे जरूर पढ़ सकते हैं।

समीक्षक - अभिलाष दत्ता

Saturday, July 25, 2020

आँखों पर पड़ा चश्मा


हम सब एक समय पर रुके हुए हैं। जीवन बहने का नाम है, पर हमने खुद को कुछ खास पलों में रोक लिया है। अपने आँखों पर एक विशेष समय का चश्मा चढ़ा लिया है। हमें उस चश्मा को उतारना होगा। वर्ना हम बदलाव के साक्षी नहीं हो पाएंगे। परमेश्वर ने जीवन में परिवर्तन का नियम बनाया है तो हम खुद को किसी काल विशेष में क्यों रोके रखना चाहते हैं ?
किसी किताब में पढ़ा था कि एक आदमी जो गौतम बुद्ध से नाराज़ होकर उनपर थूक दिया। वहाँ मौजूद गौतम बुद्ध के सभी शिष्य नाराज़ हो गए। लेकिन गौतम बुद्ध ने अपने सभी शिष्यों को रोकते हुए और उन्हें समझाते हुए कहा , “नहीं इसमें इसकी गलती नहीं है। यह कुछ कहना चाहता है पर इसके पास शब्द नहीं है। इसलिए यह थूक से अपनी बात बताना चाहता है"।
वह आदमी वहाँ से चल गया पर पूरी रात उसे नींद नहीं आयी। दूसरे दिन वह आदमी रोते हुए जाकर गौतम बुद्ध के चरणों मे गिर गया। उसने गौतम बुद्ध से माफी माँगी, पर गौतम बुद्ध ने कहा, “कल जो आदमी थूक कर गया वह तुम नहीं हो। थूकने वाला माफी नहीं माँग सकता। और जो माफी माँग रहा है वह थूक नहीं सकता। दोनों घटनाओं में चौबीस घण्टे बीत चुके हैं। समय बढ़ चुका है, नदियाँ आगे की ओर बढ़ चुकी हैं। जो मैं कल था वह आज नहीं हूँ और जो तुम कल थे वो आज नहीं हो। तो फिर तुम किस बात की माफी माँग रहे हो और मैं तुम्हें उस गलती के लिए कैसे क्षमा कर दूँ जो तुमने मेरे साथ किया ही नहीं था।”

यहाँ दो बातें स्प्ष्ट होती है :-

पहला, समय हर पल बदलता है हम बीते हुए समय को नहीं बदल सकते और उसे याद रख कर भी कुछ हासिल नहीं कर सकते।
दूसरा, हमें अपने तमस पर काबू रख कर गौतम बुद्ध बनना चाहिए। अगर थूकने वाले व्यक्ति पर बुद्ध या उनके शिष्य नाराज़गी दिखा देते तो क्या वह आदमी एक रात में अपनी गलती पर पश्चाताप कर पाता? नहीं, उसके अंदर कटुता और बढ़ जाती।

हमें इस तरह के चश्मे को उतार देना है। क्योंकि आप ठगे जाएंगे। दो लड़के हैं एक को बताया गया ये पत्थर में परमेश्वर है दूसरे को बताया गया इसमें शैतान है। दोनों ने उसे अपने चश्में के हिसाब से जीवन भर देखा। दोनों लड़के समय के साथ अपनी-अपनी सोच के साथ मृत्यु को प्राप्त हो गए। उस पत्थर से ना कभी परमेश्वर उतपन्न हुए और ना ही वो शैतान। किसी ने पत्थर को पत्थर की तरह देखा ही नहीं। पत्थर हमेशा पत्थर ही रहा...
उसी तरह हर रोज़ नए लिखने वाले सोचते हैं कि ये आदमी (अभिलाष - उदाहरण स्वरूप) सीनियर लेखक हैं। यह हमारी रचनाओं पर समीक्षा करेगा, हमारी रचनाओं को पढ़ेगा। पर वह सीनियर लेखक जो अभिलाष है उसे आपने अभिलाष के तौर पर देखा ही नहीं। अभिलाष खुद परेशान है उसकी रचनाओं को कौन पढ़ेगा ? जैसे आप अभिलाष को सीनियर राइटर मान कर उसे अपना सब कुछ पढा देना चाहते हैं, ठीक उसी तरह अभिलाष के मन में भी कोई दूसरा लेखक सीनियर बना बैठा है। अभिलाष का वह सीनियर लेखक ये सोचता है , “क्या इसकी रचना है एकदम बेकार कौन पढ़े"?
ठीक यही चीज़ अभिलाष आपके रचना के बारे में सोच सकता है।
इसलिए मैं कहता हूँ उन चश्में को उतारिये और खुद जीवन के साथ बहना सीखिए।

Wednesday, September 25, 2019

पटना और पत्रकारिता...

वह सभी बच्चें जो इस साल बारहवीं की बोर्ड एग्जाम देने वाले हैं, उन सबके लिए एक सुझाव। बारहवीं के बाद पटना से पत्रकारिता का करने का शौक गलती से मत पालना। बिहार में पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई बड़ा स्कोप नहीं है। कॉलेज के शुरुआती दिनों में पत्रकारिता की पढ़ाई करना वाकई अच्छा लगता है। कभी किसी इवेंट में जाना, नाटक देखना, फिल्मे देखना उसपर समीक्षा लिखना। बेशक, ये हमारे कोर्स का हिस्सा होता है। देखने में कितना ग्लैमर लगता है। दूसरे क्षेत्र के लोगों को भी यही गलतफहमी होती है कि क्या चमक धमक है मीडिया क्षेत्र में। 
पर सच्चाई,
कॉलेज से निकलने के बाद आप या तो आगे की पढ़ाई करेंगे या फिर नौकरी की तलाश। जो आगे पढ़ना चाहते हैं उनके लिए सुझाव अगर मास्टर्स की पढ़ाई पत्रकारिता से ही करनी है तो बिना सोचे बिहार छोड़ो। यहाँ अपने आप को सिर्फ धोखा दोगे। 
अब आतें है उनपर जो स्नातक करने के बाद नौकरी की तलाश में निकलते हैं। तो ये बात किसी से छिपी नहीं है यहाँ किसी भी कॉलेज में पत्रकारिता विभाग में कैंपस सिलेक्शन नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। 
इसके बाद निकलते हैं बच्चें इंटर्नशिप करने के लिए। एक - दो साल खींच - खींच के 4 - 5 जगह से इंटर्नशिप कर ही लेते हैं। लेकिन इंटर्नशिप में उन्हें कोई भी संस्थान पैसा नहीं देती है। 
पत्रकारिता के बदलते दौर में पटना में कुकुरमुत्तों की तरह वेब पोर्टल, यूट्यूब न्यूज़ चैनल, फेसबुक पेज के माध्यम से लोगों तक खबरें भेजी जा रही हैं। दावा किया जाता है अखबारों से पहले हम। मोहल्ले तक की खबरे अब छिपती नहीं है। पर ये खबरें लाकर देगा कौन ? इसके लिए 1000-2000 रुपये की अस्थायी नौकरी पर उन्हीं बच्चों को रखा जाता है जो पत्रकारिता से स्नातक किये रहते हैं। संस्थाओं द्वारा उन्हें विश्वास दिलाया जाता है वह रिपोर्टर हैं। उनका आई - कार्ड पर सिटी रिपोर्टर का तमगा लगा रहता है। बाइक के आगे अंग्रेजी के बड़े - बड़े अक्षरों में प्रेस लिखवाया जाता है। यह वह ब्रह्म मोह पास है जिसके अंदर जाने पर कोई नहीं निकल पाता है। पत्रकार बनने की जगह सिर्फ संवाद - सूत्र बन कर रह जाते हैं। कुछ महीने काम कर लेने के बाद जब वह अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बात करता है तो उसके सामने मीडिया हाउसेस द्वारा फण्ड का रोना रोते हुए अपना असली चेहरा दिखाते हैं। साथ में यह भी बताया जाता है कि तुममें सिर्फ लिखने की क्षमता है टेक्निकल नहीं होने के कारण हम तुम्हें कितना पैसा दे सकते हैं !
कोई चारा नहीं देखते हुए वह नया पत्रकार मन मसोस कर के दुबारा काम पर लग जाता है। उस 2000 के लिए उसे कभी भी किसी भी जगह किसी भी वक़्त पर भेज दिया जाता है। घिरनी की तरह नचाया जाता है। इस घिरनी पत्रकारिता के चक्कर में पत्रकारिता के अन्य आयाम जैसे फ़िल्म, संदर्भ पत्रकारिता, एडिटिंग, किताबों का अध्ययन ये सब कहीं पीछे छूट जाता है। वैसे भी इन तमाम विषयों पर भी पटना में कोई स्कोप नहीं है। वह नया पत्रकार सिर्फ और सिर्फ संवाद - सूत्र बन कर रह जाता है। 4 - 5 साल काम करने के बाद तनख्वाह पाँच हज़ार तक जाती है। अंत तक आप टिक ही नहीं सकते हैं
सिर्फ माइक पकड़ना और कैमरा के सामने के लालच में वह नया पत्रकार किसी दूसरे क्षेत्र में जाने का सोचना भी छोड़ देता हैं। इस दौर में ऐसे पत्रकार बहुत जगह हाथ - पैर मारते हैं कहीं कुछ अच्छे जगह हो जाये। पर अफसोस पटना की पत्रकारिता आपका हर जगह शोषण करती है।
पटना में रह कर पत्रकारिता करने वाले लोगों को बिहार के प्रिंट मीडिया का हाल अच्छी तरह से पता होगा। प्रिंट मीडिया में नौकरी पाना लौहे के चने चबाने जितना कठिन है। उन्हें आज के समय में एक व्यक्ति के अंदर छः व्यक्तियों के गुण वाला पत्रकार की खोज रहती है। उस नए पत्रकार को नौकरी पर रखने से पहले उसका खुद का बनाया हुआ सूत्रों का जाल हो। दूसरा उसे खबरें लिखनी आनी चाहिए। तीसरा संपादक जब जो कह दे उसे वह करने के लिए तैयार रहना चाहिए। चौथा पेज डिज़ाइन करना आना चाहिए। पाँचवा उप संपादक का कार्य आना चाहिए। और,  अंत में छठा आपके पास पत्रकारिता की डिग्री हो। इन मानकों पर कोई गलती से खड़ा नज़र आता है तो उसकी शुरुआती तनख्वाह ज्यादा से ज्यादा 8000 तक होती है। अधिकतर लोग पेज डिज़ाइन के नाम पर छांट दिए जाते हैं। उन्हें तब होश आता है कि कॉलेजों में तो पेज डिज़ाइन के नाम पर तो कभी कुछ बताया ही नहीं गया। 
प्रिंट मीडिया या किसी भी मीडिया में लोग सच्चाई लिखने की मकसद से आते हैं। उन्हें कॉलेज के दिनों से ही ये वहम निकाल देने की सलाह यहाँ दी जाती है। बात सही भी है, प्रिंट मीडिया सरकार की चाटूकारिता में लगी हुई है तो वेब पोर्टल किसी पार्टी विशेष या व्यक्ति विशेष की। 
कुछ हिम्मती वैसे भी होते हैं जो कुछ लोगों का दल बना कर पत्रकारिता में स्टार्टअप नाम की चीज़ शुरू करते हैं। आईडिया नए होने के कारण उन्हें शुरुआती सफ़लता काफी मिलती है। पर बाद में वही समस्या सामने आती है फण्ड। फण्ड नाम का जो राक्षक मुँह खोले खड़ा पत्रकारिता के क्षेत्र में इसने कभी भी पत्रकारिता को सही राह पर चलने नहीं दिया है। जिस किसी ने फण्ड जारी की खबरें अपने हिसाब से चलवाई। 
इन सबके इतर कुछ ऐसे पत्रकार भी है जो खुद का चैनल बनाने हुए हैं। उस चैनल में वही सबकुछ हैं। कहने का मतलब वन मैन आर्मी। अकेला बन्दा माइक कैमरा लेकर निकल पड़ता है रिपोर्टिंग करने। खुद एडिट भी कर लेता है। यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से उसे चला भी देता है। ऐसे पत्रकारों से एक सवाल है - भाई कमाते कितना हो ?
पटना में रहते हुए पत्रकारिता करनी है और पैसे भी अधिक कमाने है, तो इसका सीधा सा एक रास्ता है। पत्रकार नहीं दलाल बनो।
ऐसे दलाल बनों की बिस्कोमॉन भवन का ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाला दलाल भी शर्मा जाएं। बिहार में मैंने ऐसे कई वरिष्ठ पत्रकारों को नेताओं, बिल्डरों के चरणों मे गिरते देखा है। पत्रकारिता में दलाली की उत्कृष्ट उदाहरण क्या हो सकता है। चुनाव के समय बाहुबली नेता के घर में जाकर कैमरे के सामने पूछना - क्या जी ये नेता जी कुत्ता है ? नास्ता में क्या खाता है ये कुत्ता ?
इस पंक्ति से पत्रकारिता के नए विद्यार्थी बहुत कुछ सिख सकते हैं। खबरों की एंगल कैसे बनाया जाता है। वह कुत्ता अगर आपके इलाके का होता तो और भुखमरी से मर जाता तो कोई बात नहीं। लेकिन नेता जी का कुत्ता है तो उसे तो कैमरे पा आना ही था। 
।।
खैर, मुद्दा ये है कि इस क्षेत्र में रहना है तो बिहार छोड़िए। बाहर निकलिए, इसी क्षेत्र में अधिक रास्ते आपको मिलेंगे। जिसमें आपको पैसे भी अच्छे प्राप्त होंगे। लेकिन पटना में रहते हुए इस लाइन में रहना तो जीवन भर काम करने के बाद भी आप 10 हज़ार से 15 हज़ार तक की नौकरी कर पाएंगे। अखबारों में यही सैलरी 25 हज़ार तक जा सकती है।दलाली करने के बाद बेशक लाख रुपये यहाँ कमा सकते हैं।
जब आप अपने बाहर के दोस्तों को देखेंगे तो जो आराम की नौकरी में 50 हज़ार तक कमा रहा है और आप सिर्फ 5 हज़ार तो उस समय आपके पास सिर्फ हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं होगा।
इस लाइन को छोड़े या फिर इस शहर को छोड़े।


Sunday, May 12, 2019

मातृ दिवस : प्रतिपल नमन (लेख्य - मंजूषा)

मातृ दिवस : प्रतिपल नमन



“घर के अंदर ही माँ पूरी पाठशाला है”। उक्त पंक्तियां आदरणीया  कृष्णा सिंह जी ने साहित्यिक संस्था लेख्य मंजूषा, पटना के त्रैमासिक कार्यक्रम “मातृ दिवस: हर पल नमन" के अवसर में कही। अपने व्यक्तव मे  कृष्णा सिंह जी ने मंच से कहा कि माँ हमारे जीवन का अस्तित्व है। माँ के लिए तो पूरा जीवन कम पड़ जाता है। हमारा हर दिन माँ के लिए होता है।
मुख्य अतिथि के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेख्य मंजूषा की पत्रिका “साहित्यक स्पंदन" में प्रकाशित स्वर्गीय प्रेमचंद जी की रचना ईदगाह पर रोशनी डालते हुए कहा कि अगर आज हर इंसान खुद को हमीद बना ले तो वृद्धाश्रम की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार व लघुकथा के पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने इस मौके पर कहा कि आज की सभी रचना माँ को समर्पित थी। आज के दिवस किसी की रचना को जज नहीं किया जा सकता है। जो बातें आज रचना में सुनने को मिली है उसे हमें अपने जीवन मे आत्मसात करना चाहिए।
लेख्य- मंजूषा की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा कि मैं एक माँ हूँ, स्त्री जब माँ बनती है तो जीवन पर माँ ही बन कर रह जाती है। संस्था के सभी सदस्य मुझे माँ कह कर ही सम्बोधन करते हैं।
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आज के कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पहले दीप प्रज्वलित करने के बाद, साहित्यिक स्पंदन पत्रिका का लोकार्पण किया गया।
मौके पर महशूर गजलकार समीर परिमल ने चुनावी दौर पर व्यंग्य करते हुए अपनी कविता का पाठ करते हुए कहा कि एक वोट के दम पर सरकार बदलता हूँ।
कार्यक्रम में निलंशु रंजन, आयाम संस्था के अध्यक्ष गणेश जी भागी, समाजसेवी रेशमा प्रसाद जी उपस्थित थी।
मंच संचालन ईशानी सरकार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन रवि श्रीवास्तव ने किया।

आज के कार्यक्रम में जो कविताएं पढ़ी गयी। उनकी पंक्तियां:-

01. *सीमा रानी*- बरसों पहले छोड़ गयीं वो
ढेरों सपने तोड़ गयीं वो
मुख अपना मोड़ गयीं वो
तन्हा मुझको छोड़ गयीं वो
 
02. *प्रियंका श्रीवास्तव "शुभ्र"*- "माँ मात्र एक संबोधन नहीं
ये शब्द करे तन मन स्पंदन
हृदय का है प्यार उद्गार
जिसका न होता कोई आभार।"

03. *राजेन्द्र पुरोहित* – तुम सोचते हो
वो सिर्फ नौ महीने सहती है
प्रसव पीड़ा
सिर्फ नौ महीने...
नहीं
कदापि नहीं...

04. - *रब्बान अली*– दुनिया के सारे रिश्तो से अफजल है मेरी माँ
ये कायनात तेरे दम से है मेरी
प्यारी माँ

05. *पम्मी सिंह 'तृप्ति'* – बाकी सब जहाँ के रवायतों में सहेज रखा ..
पर.. जब भी घिरती हूँ दुविधाओं में
माँ..सच तेरी, बहुत कमी खलती है,

06. *श्रुत कीर्ति अग्रवाल* - जब-जब चोट लगी मेरे तन को, याद तुम्हीं क्यों आईं माँ?
हर संकट हर दुख में मैंने,
तेरी ही रट क्यों लगाई माँ?

07. *शशि शर्मा 'खुशी'*- अपने दुख का,
साया भी नहीं पड़ने देती
मगर मेरे हर दुख को
समेट लेती अपने आँचल में

08. *श्वेता सिन्हा* - गर्व सृजन का पाया
बीज प्रेम अंकुराया
कर अस्तित्व अनुभूति
सुरभित मन मुस्काया

09. *राजकांता राज* – मेरी प्यारी माँ तुझे सलाम तूझे सलाम
मुझे खाना खिलाया छोड़ सब काम
मेरी न्यारी माँ तूझे सलाम तूझे सलाम
मुझे ड्रेस पहनाया बिना देखे दाम

10. *ज्योति मिश्रा* – है एक भाव ममता का बस;  जग समझे इसकी भाषा है
वह शब्दकोश भी मिला नहीं ,  जिसमें मां की परिभाषा है  ।।

11. *सुबोध कुमार सिन्हा* -गढ़ा है अम्मा तुमने मुझे
नौ माह तक अपने गर्भ में
जैसे गढ़ी होगी
उत्कृष्ट शिल्पकारियाँ
बौद्ध भिक्षुओं ने कभी
अजंता-एलोरा की गुफाओं में

12. *शाईसता अंजूम* - माँ की यादे
माँ तेरे आँचल की छाँव न रही
कौन मेरी खौरियत की दुआ करेगा

13. *कृष्णा सिंह* - माँ के प्यार में गंगा की धार है
माँ तो सौम्य व शुचि संस्कार है
सुर, नर, मुनि की स्तुति का सार है
माँ!  ईश्वर का दिया सर्वोत्तम उपहार है।

14. *अणिमा श्रीवास्तव* - बस इसी में सिमटी है, तेरी इबादत।
क्या तुझसे बढकर भी हो सकती है कोई नेमत
खुदा ने भी जिसे दुआओं में माँगा
तू वो मन्नत है।
यू हीं नहीं कहते तेरे पैंरो तले जन्नत है।

15. *सिन्धु कुमारी* -देकर वह अनमोल धन , लेती एक न भेंट ।
माँ स्नेहिल-सी चासनी , रग-रग देती फेंट।।

16. *मधुरेश नारायण* - ओ ! माँ ! मुझे क्यूँ इतना तू सताती है?
क्यूँ मुझसे इतनी दूर चली जाती है ?
जब तक रही तू,तेरा क़द्र ना किया
जाने के बाद तेरी याद बहुत आती है !

17. *डॉ. पूनम देवा* -कैसे  भूल लूँ  माँ  तुम्हारा वो प्यार- दुलार,
तुम्ही ने तो दिया था
हम सब को संस्कार,
तुम ही थी,हमारे घर की
फूल   " सदाबहार" ।

18. *मीरा प्रकाश*  - यह उनका घर है
 उन्हीं का घर है ,
लेकिन फिर भी कभी मां को ये घर
मायका सा लगने दो।

19. *कमला अग्रवाल* -सृजनता की पहली कड़ी है माँ ,
नौ महीने कोख में रख ,
असहय वेदना को सह ,
हमें धरती पे लाती है माँ ॥

20. *प्रेमलता सिंह* (2) –माँ !आज भी  मुझे  वो दिन याद है, जब तू रोया  करती थी ।
 तकलीफ  मुझे भी होती थी
 तेरे रोने की  आवाज  मैंने  भी सूनी थी।

21. *मीनाक्षी सिंह* -सरस शीतल तरल तरंग / माँ के आँचल का हर रंग।
जितना सुकून यहां मिलता है
सारे जहां मे कहाँ मिलता हैं।

22. *अमृता सिन्हा* -काश तेरे आँचल तले
तमाम उम्र गुज़र जाती
थाम कर ऊँगली, ओ माँ
तू बचपन मेरा, फिर ले आती

23. *सुधांशु कुमार* –माँ की ममता
माँ का आँचल
प्यार स्नेह का सागर ।।
माँ का आशीर्वाद
भगवान का प्रसाद ।।
माँ की मीठी बोली
कानों की   लोरी ।। 
माँ में ही संसार
माँ में ही जीवनसार।।
   
24. *सुनील कुमार* –माँ का आँचल धरती अंबर लगता है
रूप सलोना स्नेह सरोवर लगता है

प्रेम शजर उसने ही दिल में है बोया
दिल उसका परियों सा सुंदर लगता है

25. *संजय कुमार 'संज'* -पिता की सत्ता और
शासन की संप्रभुता में
राज तुम्हारा यूँ भी रहा
कभी हँसी तू महफ़िल में
कभी अकेले आॅ॑सू भी बहा

Tuesday, May 7, 2019

हैप्पी फ्रेंडशिप डे

07 मई 2011
हाँ आज ही का तो दिन था। हाँ आज की तो दिन था। जब हम पहली बार मिले थे। मई की चिलचिलाती गर्मी थी, कंप्यूटर क्लास था, शाम का वक़्त वक़्त था, नया बैच था। टैली सीखने गए थे। घर में खाली ही बैठे थे उन दिनों। वैसे भी इंटर में आर्ट्स लेने वालों को घर वाले “घर की मुर्गी के बराबर” ही समझते हैं।
हाँ तो वह आयी,
कितनी शालीनता थी उसके चेहरे पर। मुझे याद है पहले क्लास में 8 लड़कियां और 3 लड़के थे। चलो लड़कियों की संख्या यहाँ तो अधिक थी। उसकी बड़ी बहन भी थी बैच में। आर्ट्स स्ट्रीम होने की वजह से कॉमर्स स्ट्रीम की पढ़ाई मेरे समझ से बाहर हो रही थी। वह भी आर्ट्स स्ट्रीम की ही स्टूडेंट थी।
घर में फालतू बैठे रहने के कारण मैं क्लास आधे घण्टे पहले चला आया करता था। घर में उपन्यास छिपा के पढ़ना पड़ता था। एक कोचिंग ही था जहाँ बिना किसी डर के उपन्यास पढ़ पाता था। वह रोज़ मुझे उपन्यास पढ़ते हुए देखती थी। उन दिनों भारतीय लेखकों की अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने का चस्का लगा हुआ था। उन दिनों, अंग्रेजी उपन्यास सामने वाले पर एक अलग छाप छोड़ता था।
एक दिन उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने मुझसे पूछ डाला - आप हमेशा उपन्यास पढ़ते हैं। मैंने हाँ में जवाब दिया। तब उन्होंने बताया कि उन्हें भी उपन्यास पढ़ने का मन करता है। मेरे कुछ बोलने से पहले उनकी बड़ी बहन ने मुझसे कहा - आप हमें भी दे सकते हैं उपन्यास पढ़ने के लिए।
।।
उस दिन वह उपन्यास मेरे बैग में वापस न जाकर, उनके लेडीज पर्स में छुप कर चला गया। 5 दिन हो गए पर उपन्यास वापस आयी नहीं। मुझे बेचैनी हो रही थी, पर मैंने कुछ कहा नहीं। अगले दिन उपन्यास मेरे हाथ में था। उनकी बड़ी बहन ने बताया - क्या बताऊँ अभिलाष जी एक पेज पढ़ने के बाद ही मेरा सर दर्द करने लगा। ये तो छोटी ने इसको रात - रात भर जग के पढ़ी है। मोबाइल की रोशनी जला कर।
मैं छोटी वाली की तरफ देख कर मुस्कुरा दिया। उनके चेहरे पर भी मुस्कान थी। उसके बाद उपन्यास पर चर्चा होने लगी।।
अब ये रोज़ का सिलसिला हो गया। उपन्यासों के जरिये हमारी दोस्ती आगे बढ़ रही थी। उपन्यास इस दोस्ती में सूत्रधार बन रहे थे।
हम दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। वह मेरे बारे में क्या सोचती ये तो मुझे आज तक पता नहीं चला। पर मेरे दिल के किसी कोने में एक मीठी घन्टी बजी थी।
एक दिन उन्होंने बताया कि वह कविताएं लिखती हैं। तभी पीछे से उनकी बड़ी बहन ने कहा - अभिलाष जी दो डायरी लिख के रखी है।
मेरे मुँह से केवल एक शब्द निकला - अरे वाह! क्या बात है।
मैंने उनसे कहा - क्या आप अपनी कविता मुझे नहीं देंगी पढ़ने?
उनकी बड़ी बहन ने कहा - किसी को नहीं दी है पढ़ने। सिर्फ मैंने पढ़ी है।
यह सुनकर मैंने कहा - अगर कोई बात है तो कोई दवाब नहीं है डायरी देने की।।
अगले दिन वह डायरी मेरे बैग में थी। उनकी बड़ी बहन ने हँसते हुए कहा - अरे वाह अभिलाष जी! आप तो नसीब वाले निकले। आप मेरे बाद दूसरे इंसान है जो इस डायरी को पढ़ने वाले हैं। मुझे तो उतना समझ नहीं आया। लेकिन अच्छा लिखती है। पढ़ के बताइएगा।
वह डायरी तकरीबन मैंने 1 महीने अपने पास रखा था। मैंने सारी कविता पढ़ डाली थी।
मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। केवल यही दिमाग में था कि कितना टैलेंट है इस लड़की है। अगर अपने दिल पर हाथ रखूं तो यही कविताएं मुझे लेख़क बनने की प्रेरणास्रोत थी और है।
मैंने उन्हें डायरी वापस कर दिया। केवल एक शब्द कहा - लिखना छोड़ना मत!
।।
4 महीने का कोर्स था। जो अब ख़त्म होने वाला था। क्लास खत्म होने से एक हफ्ते पहले ही मैं क्लास छोड़ने वाला था। ये बात पूरे क्लास को पता थी। जिस दिन मेरा अंतिम क्लास था, वह एक सादा  कॉपी मेरे पास लेकर आयी और कहा - अभिलाष आप इसपर अपना ऑटोग्राफ दीजिये।
मेरा मुँह खुला रह गया था। मैंने उनसे कहा - मैंने जीवन में ऐसा कोई बड़ा कार्य नहीं किया है। जो आप मेरे ऑटोग्राफ लें।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा - आप बहुत अच्छे इंसान है। आप बहुत आगे जाएंगे।
मैंने अपना ऑटोग्राफ दे दिया। जीवन का पहला ऑटोग्राफ दिया था मैंने।
ऑटोग्राफ लेने के बाद उन्होंने कहा था - इसे जीवनभर अपने पास रखूंगी।।
पीछे उसके बड़ी बहन का हो - हो सुनाई दे रहा था। जाते - जाते उन्होंने अपना नंबर मुझे दिया। उन दिनों लड़कियों के नंबर मिलना पारस पत्थर मिलने जितना बराबर था।
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मैं जा चुका था।
अब हमारी दोस्ती फ़ोन पर नया रूप ले रही थी। उनके बर्थडे पर सबसे पहले मैसेज भेजना और मेरे बर्थडे पर उनका सबसे पहले मैसेज आना।
इसके बाद मैं पढ़ाई के लिए बंगाल चला गया। लेकिन संपर्क कभी टूटा नहीं। दोस्त थे और आगे भी दोस्त रहे।
अवसाद के दिनों में भी वह हिम्मत देती रहीं। पटना वापस आने के बाद 6-7 महीनों में एक - आध बार पार्क में मिलने चला जाता था। जिस बेंच पर हम बैठते, उसके एक सिरे पर हम दूसरे सिरे पर वह। और बोलने के लिए कुछ भी नहीं।
अवसादों ने मुझे लेख़क बना दिया। और इसी दौर में वह साहित्य से दूर हुई। या यूँ कहें , हम दोनों एक दूसरे से दूर हुए। उन्हें अपनी भविष्य ठीक करनी थी। और मैं खुद को साहित्य के सागर में झोंकने को तैयार था।
हमारी दोस्ती सिर्फ एक फॉर्मेलिटी बन कर रह चुकी थी। उनके मन में क्या था , ये कभी जान सका। खुद हिम्मत कर के कभी बोल या कुछ पूछ नहीं सका।
आज हमारी फ्रेंडशिप डे है। सिर्फ एक व्हाट्सएप मैसेज...☺️

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अंत में आप सब ये जरूर सोच रहे होंगे मैंने कुछ बोला या पूछा क्यों नहीं।
तो इसका जवाब ये है-
“ये बिहार है,
और हमारी जातियाँ अलग थी”।।