Wednesday, April 15, 2026

रैंक - 80 (पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक - रैंक 80
लेखक - गोलू सेन कुंभराजी
प्रकाशक - flydreams publication
पृष्ठ - 164
मूल्य - ₹249/-
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कुछ कहानियाँ संघर्ष और प्रेम को एक साथ लेकर चलती हैं। उसी में से एक है ‘रैंक 80’। लेखक ‘गोलू सेन कुंभराजी’ ने रैंक 80 के माध्यम से यह बताया कि भारत के आज भी कुछ हिस्सों में लड़कियों की शिक्षा बहुत पीछे है। तो कुछ हिस्सों में आज भी साहूकारों के ब्याज के जाल में लोग फंसे हुए हैं। 
पहले अध्याय में संध्या के संघर्ष की भूमिका बांधी गयी है। तो ऐसा प्रतीत होता है कि आगे पूरी कहानी संध्या के दृष्टिकोण से देखने को मिलेगी, लेकिन अगले ही अध्याय में कहानी में रुद्र का आगमन होता है और कहानी संध्या से रुद्र की तरफ खिसक जाता है और संध्या सिर्फ एक सहयोगी पात्र बनकर रह जाती है। यहाँ लेखक ने ऐसा प्रयोग क्यों किया है, ये तो वही बता सकते हैं। कहानी का बैकग्राउंड upsc है। वैसे तो upsc के मुद्दे पर आज से दस-बारह साल पहले कई उपन्यास लिखे गए और उसमें कई हिट भी हुए। इस कारण इस किताब में फिर से आपको दिल्ली के मुखर्जी नगर के दर्शन होंगे। upsc मुद्दे के कारण किताब में दुहरावपन का शिकार होती है। लेकिन अन्य upsc आधीरात उपन्यासों में कॉमेडी का तड़का होता है, वह इसमें गायब है।
किताब अच्छी बनी है, एकबार पढ़ने लायक है।


समीक्षक - अभिलाष दत्ता

Tuesday, March 31, 2026

The प्रोफेसर साहब - पुस्तक समीक्षा

#बातचीत 
#समीक्षा 
पुस्तक - The प्रोफेसर साहब
लेखिका - श्रीयांशी चौबे Shreeyanshi Choubey 
प्रकाशक - flydreams publication FlyDreams Publications 
मूल्य - ₹249/- (पुस्तक पर अंकित)
पृष्ठ - 174
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हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कोई एक ऐसा शख्श जरूर आता है, जिसके व्यतित्व से वह अपने आसपास के अधिकतर लोगों को प्रभावित कर लेता है। वैसे तो यह गुण कुछ लोगों में जन्मजात होते हैं और कुछ इसके अलग-अलग कोर्स, वर्कशॉप इत्यादि से रोजाना अभ्यास से खुद को बेहतर बनाते चले जाते हैं। ऐसे अधिकतर लोग आगे चलकर मोटिवेशनल स्पीकर इत्यादि का कार्य करते हैं। वैसे यह गुण एक शिक्षक और प्रोफेसर में होना बहुत जरूरी है, वरना आप अपने छात्रों के अंतर्मन से सही से जुड़ नहीं पाएंगे। 
यह पूरी भूमिका पटना की नव- लेखिका ‘श्रीयांशी चौबे’ की प्रथम पुस्तक (उपन्यास) ‘The प्रोफेसर साहब’ के प्रोफेसर राघव (मुख्य पात्र) के गुणों को दर्शाता है। प्रोफेसर साहब अपने ज़िंदादिली, सौम्य और बहिर्मुखी स्वभाव के कारण हर किसी के दिल में उतर जाते हैं। हर किसी को मोटिवेट करने वाले प्रोफेसर साहब पर कहानी की नायिका सृष्टि का दिल आ जाता है। लेकिन उन दोनों के बीच प्रोफेसर और छात्रा वाला संबंध है। पर सृष्टि यहाँ ये भूल जाती है कि प्रोफेसर साहब का एक प्रोफेशनल जीवन के साथ-साथ एक पर्सनल जीवन भी है। जब सृष्टि को प्रोफेसर साहब के पर्सनल जीवन के राज सामने आते हैं, तो वह खुद को ठगा हुआ पाती है। सच्चाई जानने के बाद वह खुद से प्रश्न करती है कि प्रोफेसर साहब के जीवन में हज़ारों छात्र-छात्राएं आये होंगे। और इतने सुलझे व्यक्ति कैसे एक खास के चक्कर में अपना सबकुछ बर्बाद करने की सोच लेंगे।
यह कहानी आपको पटना की उस सच्चाई से रूबरू करवाती हैं, जहाँ आजकल खुद को सफलता हासिल करने कोई कैसे दूसरों के मन और आत्मा के साथ खेल जाता है। यह कहानी आपको यह भी बताती है कि कोई व्यक्ति जीवन में इतना ठगे जाने के बाद भी अपने प्रोफेशनल लाइफ पर उसका असर तक नहीं आने देता है। 
आपको नैत्रि का किरदार शुरू में एकदम समझ में नहीं आएगा, लेकिन कहानी के अंत होते-होते उसकी महत्वकांक्षा आपको उसके असली चेहरे से रूबरू करवा देगा। नैत्रि के किरदार के आने के बाद सृष्टि सिर्फ एक सहयोगी किरदार बनकर रह जाती है।
लेखिका श्रीयांशी चौबे ने अपनी पहली पुस्तक में एक कठिन और संवेदनशील मुद्दे को सबके सामने प्रस्तुत किया है। किताब अच्छी लिखी गयी है। एक बार आप इसे जरूर पढ़ सकते हैं।

समीक्षक - अभिलाष दत्ता

Saturday, July 25, 2020

आँखों पर पड़ा चश्मा


हम सब एक समय पर रुके हुए हैं। जीवन बहने का नाम है, पर हमने खुद को कुछ खास पलों में रोक लिया है। अपने आँखों पर एक विशेष समय का चश्मा चढ़ा लिया है। हमें उस चश्मा को उतारना होगा। वर्ना हम बदलाव के साक्षी नहीं हो पाएंगे। परमेश्वर ने जीवन में परिवर्तन का नियम बनाया है तो हम खुद को किसी काल विशेष में क्यों रोके रखना चाहते हैं ?
किसी किताब में पढ़ा था कि एक आदमी जो गौतम बुद्ध से नाराज़ होकर उनपर थूक दिया। वहाँ मौजूद गौतम बुद्ध के सभी शिष्य नाराज़ हो गए। लेकिन गौतम बुद्ध ने अपने सभी शिष्यों को रोकते हुए और उन्हें समझाते हुए कहा , “नहीं इसमें इसकी गलती नहीं है। यह कुछ कहना चाहता है पर इसके पास शब्द नहीं है। इसलिए यह थूक से अपनी बात बताना चाहता है"।
वह आदमी वहाँ से चल गया पर पूरी रात उसे नींद नहीं आयी। दूसरे दिन वह आदमी रोते हुए जाकर गौतम बुद्ध के चरणों मे गिर गया। उसने गौतम बुद्ध से माफी माँगी, पर गौतम बुद्ध ने कहा, “कल जो आदमी थूक कर गया वह तुम नहीं हो। थूकने वाला माफी नहीं माँग सकता। और जो माफी माँग रहा है वह थूक नहीं सकता। दोनों घटनाओं में चौबीस घण्टे बीत चुके हैं। समय बढ़ चुका है, नदियाँ आगे की ओर बढ़ चुकी हैं। जो मैं कल था वह आज नहीं हूँ और जो तुम कल थे वो आज नहीं हो। तो फिर तुम किस बात की माफी माँग रहे हो और मैं तुम्हें उस गलती के लिए कैसे क्षमा कर दूँ जो तुमने मेरे साथ किया ही नहीं था।”

यहाँ दो बातें स्प्ष्ट होती है :-

पहला, समय हर पल बदलता है हम बीते हुए समय को नहीं बदल सकते और उसे याद रख कर भी कुछ हासिल नहीं कर सकते।
दूसरा, हमें अपने तमस पर काबू रख कर गौतम बुद्ध बनना चाहिए। अगर थूकने वाले व्यक्ति पर बुद्ध या उनके शिष्य नाराज़गी दिखा देते तो क्या वह आदमी एक रात में अपनी गलती पर पश्चाताप कर पाता? नहीं, उसके अंदर कटुता और बढ़ जाती।

हमें इस तरह के चश्मे को उतार देना है। क्योंकि आप ठगे जाएंगे। दो लड़के हैं एक को बताया गया ये पत्थर में परमेश्वर है दूसरे को बताया गया इसमें शैतान है। दोनों ने उसे अपने चश्में के हिसाब से जीवन भर देखा। दोनों लड़के समय के साथ अपनी-अपनी सोच के साथ मृत्यु को प्राप्त हो गए। उस पत्थर से ना कभी परमेश्वर उतपन्न हुए और ना ही वो शैतान। किसी ने पत्थर को पत्थर की तरह देखा ही नहीं। पत्थर हमेशा पत्थर ही रहा...
उसी तरह हर रोज़ नए लिखने वाले सोचते हैं कि ये आदमी (अभिलाष - उदाहरण स्वरूप) सीनियर लेखक हैं। यह हमारी रचनाओं पर समीक्षा करेगा, हमारी रचनाओं को पढ़ेगा। पर वह सीनियर लेखक जो अभिलाष है उसे आपने अभिलाष के तौर पर देखा ही नहीं। अभिलाष खुद परेशान है उसकी रचनाओं को कौन पढ़ेगा ? जैसे आप अभिलाष को सीनियर राइटर मान कर उसे अपना सब कुछ पढा देना चाहते हैं, ठीक उसी तरह अभिलाष के मन में भी कोई दूसरा लेखक सीनियर बना बैठा है। अभिलाष का वह सीनियर लेखक ये सोचता है , “क्या इसकी रचना है एकदम बेकार कौन पढ़े"?
ठीक यही चीज़ अभिलाष आपके रचना के बारे में सोच सकता है।
इसलिए मैं कहता हूँ उन चश्में को उतारिये और खुद जीवन के साथ बहना सीखिए।

Wednesday, September 25, 2019

पटना और पत्रकारिता...

वह सभी बच्चें जो इस साल बारहवीं की बोर्ड एग्जाम देने वाले हैं, उन सबके लिए एक सुझाव। बारहवीं के बाद पटना से पत्रकारिता का करने का शौक गलती से मत पालना। बिहार में पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई बड़ा स्कोप नहीं है। कॉलेज के शुरुआती दिनों में पत्रकारिता की पढ़ाई करना वाकई अच्छा लगता है। कभी किसी इवेंट में जाना, नाटक देखना, फिल्मे देखना उसपर समीक्षा लिखना। बेशक, ये हमारे कोर्स का हिस्सा होता है। देखने में कितना ग्लैमर लगता है। दूसरे क्षेत्र के लोगों को भी यही गलतफहमी होती है कि क्या चमक धमक है मीडिया क्षेत्र में। 
पर सच्चाई,
कॉलेज से निकलने के बाद आप या तो आगे की पढ़ाई करेंगे या फिर नौकरी की तलाश। जो आगे पढ़ना चाहते हैं उनके लिए सुझाव अगर मास्टर्स की पढ़ाई पत्रकारिता से ही करनी है तो बिना सोचे बिहार छोड़ो। यहाँ अपने आप को सिर्फ धोखा दोगे। 
अब आतें है उनपर जो स्नातक करने के बाद नौकरी की तलाश में निकलते हैं। तो ये बात किसी से छिपी नहीं है यहाँ किसी भी कॉलेज में पत्रकारिता विभाग में कैंपस सिलेक्शन नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। 
इसके बाद निकलते हैं बच्चें इंटर्नशिप करने के लिए। एक - दो साल खींच - खींच के 4 - 5 जगह से इंटर्नशिप कर ही लेते हैं। लेकिन इंटर्नशिप में उन्हें कोई भी संस्थान पैसा नहीं देती है। 
पत्रकारिता के बदलते दौर में पटना में कुकुरमुत्तों की तरह वेब पोर्टल, यूट्यूब न्यूज़ चैनल, फेसबुक पेज के माध्यम से लोगों तक खबरें भेजी जा रही हैं। दावा किया जाता है अखबारों से पहले हम। मोहल्ले तक की खबरे अब छिपती नहीं है। पर ये खबरें लाकर देगा कौन ? इसके लिए 1000-2000 रुपये की अस्थायी नौकरी पर उन्हीं बच्चों को रखा जाता है जो पत्रकारिता से स्नातक किये रहते हैं। संस्थाओं द्वारा उन्हें विश्वास दिलाया जाता है वह रिपोर्टर हैं। उनका आई - कार्ड पर सिटी रिपोर्टर का तमगा लगा रहता है। बाइक के आगे अंग्रेजी के बड़े - बड़े अक्षरों में प्रेस लिखवाया जाता है। यह वह ब्रह्म मोह पास है जिसके अंदर जाने पर कोई नहीं निकल पाता है। पत्रकार बनने की जगह सिर्फ संवाद - सूत्र बन कर रह जाते हैं। कुछ महीने काम कर लेने के बाद जब वह अपनी तनख्वाह बढ़ाने की बात करता है तो उसके सामने मीडिया हाउसेस द्वारा फण्ड का रोना रोते हुए अपना असली चेहरा दिखाते हैं। साथ में यह भी बताया जाता है कि तुममें सिर्फ लिखने की क्षमता है टेक्निकल नहीं होने के कारण हम तुम्हें कितना पैसा दे सकते हैं !
कोई चारा नहीं देखते हुए वह नया पत्रकार मन मसोस कर के दुबारा काम पर लग जाता है। उस 2000 के लिए उसे कभी भी किसी भी जगह किसी भी वक़्त पर भेज दिया जाता है। घिरनी की तरह नचाया जाता है। इस घिरनी पत्रकारिता के चक्कर में पत्रकारिता के अन्य आयाम जैसे फ़िल्म, संदर्भ पत्रकारिता, एडिटिंग, किताबों का अध्ययन ये सब कहीं पीछे छूट जाता है। वैसे भी इन तमाम विषयों पर भी पटना में कोई स्कोप नहीं है। वह नया पत्रकार सिर्फ और सिर्फ संवाद - सूत्र बन कर रह जाता है। 4 - 5 साल काम करने के बाद तनख्वाह पाँच हज़ार तक जाती है। अंत तक आप टिक ही नहीं सकते हैं
सिर्फ माइक पकड़ना और कैमरा के सामने के लालच में वह नया पत्रकार किसी दूसरे क्षेत्र में जाने का सोचना भी छोड़ देता हैं। इस दौर में ऐसे पत्रकार बहुत जगह हाथ - पैर मारते हैं कहीं कुछ अच्छे जगह हो जाये। पर अफसोस पटना की पत्रकारिता आपका हर जगह शोषण करती है।
पटना में रह कर पत्रकारिता करने वाले लोगों को बिहार के प्रिंट मीडिया का हाल अच्छी तरह से पता होगा। प्रिंट मीडिया में नौकरी पाना लौहे के चने चबाने जितना कठिन है। उन्हें आज के समय में एक व्यक्ति के अंदर छः व्यक्तियों के गुण वाला पत्रकार की खोज रहती है। उस नए पत्रकार को नौकरी पर रखने से पहले उसका खुद का बनाया हुआ सूत्रों का जाल हो। दूसरा उसे खबरें लिखनी आनी चाहिए। तीसरा संपादक जब जो कह दे उसे वह करने के लिए तैयार रहना चाहिए। चौथा पेज डिज़ाइन करना आना चाहिए। पाँचवा उप संपादक का कार्य आना चाहिए। और,  अंत में छठा आपके पास पत्रकारिता की डिग्री हो। इन मानकों पर कोई गलती से खड़ा नज़र आता है तो उसकी शुरुआती तनख्वाह ज्यादा से ज्यादा 8000 तक होती है। अधिकतर लोग पेज डिज़ाइन के नाम पर छांट दिए जाते हैं। उन्हें तब होश आता है कि कॉलेजों में तो पेज डिज़ाइन के नाम पर तो कभी कुछ बताया ही नहीं गया। 
प्रिंट मीडिया या किसी भी मीडिया में लोग सच्चाई लिखने की मकसद से आते हैं। उन्हें कॉलेज के दिनों से ही ये वहम निकाल देने की सलाह यहाँ दी जाती है। बात सही भी है, प्रिंट मीडिया सरकार की चाटूकारिता में लगी हुई है तो वेब पोर्टल किसी पार्टी विशेष या व्यक्ति विशेष की। 
कुछ हिम्मती वैसे भी होते हैं जो कुछ लोगों का दल बना कर पत्रकारिता में स्टार्टअप नाम की चीज़ शुरू करते हैं। आईडिया नए होने के कारण उन्हें शुरुआती सफ़लता काफी मिलती है। पर बाद में वही समस्या सामने आती है फण्ड। फण्ड नाम का जो राक्षक मुँह खोले खड़ा पत्रकारिता के क्षेत्र में इसने कभी भी पत्रकारिता को सही राह पर चलने नहीं दिया है। जिस किसी ने फण्ड जारी की खबरें अपने हिसाब से चलवाई। 
इन सबके इतर कुछ ऐसे पत्रकार भी है जो खुद का चैनल बनाने हुए हैं। उस चैनल में वही सबकुछ हैं। कहने का मतलब वन मैन आर्मी। अकेला बन्दा माइक कैमरा लेकर निकल पड़ता है रिपोर्टिंग करने। खुद एडिट भी कर लेता है। यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से उसे चला भी देता है। ऐसे पत्रकारों से एक सवाल है - भाई कमाते कितना हो ?
पटना में रहते हुए पत्रकारिता करनी है और पैसे भी अधिक कमाने है, तो इसका सीधा सा एक रास्ता है। पत्रकार नहीं दलाल बनो।
ऐसे दलाल बनों की बिस्कोमॉन भवन का ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाला दलाल भी शर्मा जाएं। बिहार में मैंने ऐसे कई वरिष्ठ पत्रकारों को नेताओं, बिल्डरों के चरणों मे गिरते देखा है। पत्रकारिता में दलाली की उत्कृष्ट उदाहरण क्या हो सकता है। चुनाव के समय बाहुबली नेता के घर में जाकर कैमरे के सामने पूछना - क्या जी ये नेता जी कुत्ता है ? नास्ता में क्या खाता है ये कुत्ता ?
इस पंक्ति से पत्रकारिता के नए विद्यार्थी बहुत कुछ सिख सकते हैं। खबरों की एंगल कैसे बनाया जाता है। वह कुत्ता अगर आपके इलाके का होता तो और भुखमरी से मर जाता तो कोई बात नहीं। लेकिन नेता जी का कुत्ता है तो उसे तो कैमरे पा आना ही था। 
।।
खैर, मुद्दा ये है कि इस क्षेत्र में रहना है तो बिहार छोड़िए। बाहर निकलिए, इसी क्षेत्र में अधिक रास्ते आपको मिलेंगे। जिसमें आपको पैसे भी अच्छे प्राप्त होंगे। लेकिन पटना में रहते हुए इस लाइन में रहना तो जीवन भर काम करने के बाद भी आप 10 हज़ार से 15 हज़ार तक की नौकरी कर पाएंगे। अखबारों में यही सैलरी 25 हज़ार तक जा सकती है।दलाली करने के बाद बेशक लाख रुपये यहाँ कमा सकते हैं।
जब आप अपने बाहर के दोस्तों को देखेंगे तो जो आराम की नौकरी में 50 हज़ार तक कमा रहा है और आप सिर्फ 5 हज़ार तो उस समय आपके पास सिर्फ हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं होगा।
इस लाइन को छोड़े या फिर इस शहर को छोड़े।


Sunday, May 12, 2019

मातृ दिवस : प्रतिपल नमन (लेख्य - मंजूषा)

मातृ दिवस : प्रतिपल नमन



“घर के अंदर ही माँ पूरी पाठशाला है”। उक्त पंक्तियां आदरणीया  कृष्णा सिंह जी ने साहित्यिक संस्था लेख्य मंजूषा, पटना के त्रैमासिक कार्यक्रम “मातृ दिवस: हर पल नमन" के अवसर में कही। अपने व्यक्तव मे  कृष्णा सिंह जी ने मंच से कहा कि माँ हमारे जीवन का अस्तित्व है। माँ के लिए तो पूरा जीवन कम पड़ जाता है। हमारा हर दिन माँ के लिए होता है।
मुख्य अतिथि के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेख्य मंजूषा की पत्रिका “साहित्यक स्पंदन" में प्रकाशित स्वर्गीय प्रेमचंद जी की रचना ईदगाह पर रोशनी डालते हुए कहा कि अगर आज हर इंसान खुद को हमीद बना ले तो वृद्धाश्रम की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार व लघुकथा के पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने इस मौके पर कहा कि आज की सभी रचना माँ को समर्पित थी। आज के दिवस किसी की रचना को जज नहीं किया जा सकता है। जो बातें आज रचना में सुनने को मिली है उसे हमें अपने जीवन मे आत्मसात करना चाहिए।
लेख्य- मंजूषा की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा कि मैं एक माँ हूँ, स्त्री जब माँ बनती है तो जीवन पर माँ ही बन कर रह जाती है। संस्था के सभी सदस्य मुझे माँ कह कर ही सम्बोधन करते हैं।
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आज के कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पहले दीप प्रज्वलित करने के बाद, साहित्यिक स्पंदन पत्रिका का लोकार्पण किया गया।
मौके पर महशूर गजलकार समीर परिमल ने चुनावी दौर पर व्यंग्य करते हुए अपनी कविता का पाठ करते हुए कहा कि एक वोट के दम पर सरकार बदलता हूँ।
कार्यक्रम में निलंशु रंजन, आयाम संस्था के अध्यक्ष गणेश जी भागी, समाजसेवी रेशमा प्रसाद जी उपस्थित थी।
मंच संचालन ईशानी सरकार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन रवि श्रीवास्तव ने किया।

आज के कार्यक्रम में जो कविताएं पढ़ी गयी। उनकी पंक्तियां:-

01. *सीमा रानी*- बरसों पहले छोड़ गयीं वो
ढेरों सपने तोड़ गयीं वो
मुख अपना मोड़ गयीं वो
तन्हा मुझको छोड़ गयीं वो
 
02. *प्रियंका श्रीवास्तव "शुभ्र"*- "माँ मात्र एक संबोधन नहीं
ये शब्द करे तन मन स्पंदन
हृदय का है प्यार उद्गार
जिसका न होता कोई आभार।"

03. *राजेन्द्र पुरोहित* – तुम सोचते हो
वो सिर्फ नौ महीने सहती है
प्रसव पीड़ा
सिर्फ नौ महीने...
नहीं
कदापि नहीं...

04. - *रब्बान अली*– दुनिया के सारे रिश्तो से अफजल है मेरी माँ
ये कायनात तेरे दम से है मेरी
प्यारी माँ

05. *पम्मी सिंह 'तृप्ति'* – बाकी सब जहाँ के रवायतों में सहेज रखा ..
पर.. जब भी घिरती हूँ दुविधाओं में
माँ..सच तेरी, बहुत कमी खलती है,

06. *श्रुत कीर्ति अग्रवाल* - जब-जब चोट लगी मेरे तन को, याद तुम्हीं क्यों आईं माँ?
हर संकट हर दुख में मैंने,
तेरी ही रट क्यों लगाई माँ?

07. *शशि शर्मा 'खुशी'*- अपने दुख का,
साया भी नहीं पड़ने देती
मगर मेरे हर दुख को
समेट लेती अपने आँचल में

08. *श्वेता सिन्हा* - गर्व सृजन का पाया
बीज प्रेम अंकुराया
कर अस्तित्व अनुभूति
सुरभित मन मुस्काया

09. *राजकांता राज* – मेरी प्यारी माँ तुझे सलाम तूझे सलाम
मुझे खाना खिलाया छोड़ सब काम
मेरी न्यारी माँ तूझे सलाम तूझे सलाम
मुझे ड्रेस पहनाया बिना देखे दाम

10. *ज्योति मिश्रा* – है एक भाव ममता का बस;  जग समझे इसकी भाषा है
वह शब्दकोश भी मिला नहीं ,  जिसमें मां की परिभाषा है  ।।

11. *सुबोध कुमार सिन्हा* -गढ़ा है अम्मा तुमने मुझे
नौ माह तक अपने गर्भ में
जैसे गढ़ी होगी
उत्कृष्ट शिल्पकारियाँ
बौद्ध भिक्षुओं ने कभी
अजंता-एलोरा की गुफाओं में

12. *शाईसता अंजूम* - माँ की यादे
माँ तेरे आँचल की छाँव न रही
कौन मेरी खौरियत की दुआ करेगा

13. *कृष्णा सिंह* - माँ के प्यार में गंगा की धार है
माँ तो सौम्य व शुचि संस्कार है
सुर, नर, मुनि की स्तुति का सार है
माँ!  ईश्वर का दिया सर्वोत्तम उपहार है।

14. *अणिमा श्रीवास्तव* - बस इसी में सिमटी है, तेरी इबादत।
क्या तुझसे बढकर भी हो सकती है कोई नेमत
खुदा ने भी जिसे दुआओं में माँगा
तू वो मन्नत है।
यू हीं नहीं कहते तेरे पैंरो तले जन्नत है।

15. *सिन्धु कुमारी* -देकर वह अनमोल धन , लेती एक न भेंट ।
माँ स्नेहिल-सी चासनी , रग-रग देती फेंट।।

16. *मधुरेश नारायण* - ओ ! माँ ! मुझे क्यूँ इतना तू सताती है?
क्यूँ मुझसे इतनी दूर चली जाती है ?
जब तक रही तू,तेरा क़द्र ना किया
जाने के बाद तेरी याद बहुत आती है !

17. *डॉ. पूनम देवा* -कैसे  भूल लूँ  माँ  तुम्हारा वो प्यार- दुलार,
तुम्ही ने तो दिया था
हम सब को संस्कार,
तुम ही थी,हमारे घर की
फूल   " सदाबहार" ।

18. *मीरा प्रकाश*  - यह उनका घर है
 उन्हीं का घर है ,
लेकिन फिर भी कभी मां को ये घर
मायका सा लगने दो।

19. *कमला अग्रवाल* -सृजनता की पहली कड़ी है माँ ,
नौ महीने कोख में रख ,
असहय वेदना को सह ,
हमें धरती पे लाती है माँ ॥

20. *प्रेमलता सिंह* (2) –माँ !आज भी  मुझे  वो दिन याद है, जब तू रोया  करती थी ।
 तकलीफ  मुझे भी होती थी
 तेरे रोने की  आवाज  मैंने  भी सूनी थी।

21. *मीनाक्षी सिंह* -सरस शीतल तरल तरंग / माँ के आँचल का हर रंग।
जितना सुकून यहां मिलता है
सारे जहां मे कहाँ मिलता हैं।

22. *अमृता सिन्हा* -काश तेरे आँचल तले
तमाम उम्र गुज़र जाती
थाम कर ऊँगली, ओ माँ
तू बचपन मेरा, फिर ले आती

23. *सुधांशु कुमार* –माँ की ममता
माँ का आँचल
प्यार स्नेह का सागर ।।
माँ का आशीर्वाद
भगवान का प्रसाद ।।
माँ की मीठी बोली
कानों की   लोरी ।। 
माँ में ही संसार
माँ में ही जीवनसार।।
   
24. *सुनील कुमार* –माँ का आँचल धरती अंबर लगता है
रूप सलोना स्नेह सरोवर लगता है

प्रेम शजर उसने ही दिल में है बोया
दिल उसका परियों सा सुंदर लगता है

25. *संजय कुमार 'संज'* -पिता की सत्ता और
शासन की संप्रभुता में
राज तुम्हारा यूँ भी रहा
कभी हँसी तू महफ़िल में
कभी अकेले आॅ॑सू भी बहा

Tuesday, May 7, 2019

हैप्पी फ्रेंडशिप डे

07 मई 2011
हाँ आज ही का तो दिन था। हाँ आज की तो दिन था। जब हम पहली बार मिले थे। मई की चिलचिलाती गर्मी थी, कंप्यूटर क्लास था, शाम का वक़्त वक़्त था, नया बैच था। टैली सीखने गए थे। घर में खाली ही बैठे थे उन दिनों। वैसे भी इंटर में आर्ट्स लेने वालों को घर वाले “घर की मुर्गी के बराबर” ही समझते हैं।
हाँ तो वह आयी,
कितनी शालीनता थी उसके चेहरे पर। मुझे याद है पहले क्लास में 8 लड़कियां और 3 लड़के थे। चलो लड़कियों की संख्या यहाँ तो अधिक थी। उसकी बड़ी बहन भी थी बैच में। आर्ट्स स्ट्रीम होने की वजह से कॉमर्स स्ट्रीम की पढ़ाई मेरे समझ से बाहर हो रही थी। वह भी आर्ट्स स्ट्रीम की ही स्टूडेंट थी।
घर में फालतू बैठे रहने के कारण मैं क्लास आधे घण्टे पहले चला आया करता था। घर में उपन्यास छिपा के पढ़ना पड़ता था। एक कोचिंग ही था जहाँ बिना किसी डर के उपन्यास पढ़ पाता था। वह रोज़ मुझे उपन्यास पढ़ते हुए देखती थी। उन दिनों भारतीय लेखकों की अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने का चस्का लगा हुआ था। उन दिनों, अंग्रेजी उपन्यास सामने वाले पर एक अलग छाप छोड़ता था।
एक दिन उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने मुझसे पूछ डाला - आप हमेशा उपन्यास पढ़ते हैं। मैंने हाँ में जवाब दिया। तब उन्होंने बताया कि उन्हें भी उपन्यास पढ़ने का मन करता है। मेरे कुछ बोलने से पहले उनकी बड़ी बहन ने मुझसे कहा - आप हमें भी दे सकते हैं उपन्यास पढ़ने के लिए।
।।
उस दिन वह उपन्यास मेरे बैग में वापस न जाकर, उनके लेडीज पर्स में छुप कर चला गया। 5 दिन हो गए पर उपन्यास वापस आयी नहीं। मुझे बेचैनी हो रही थी, पर मैंने कुछ कहा नहीं। अगले दिन उपन्यास मेरे हाथ में था। उनकी बड़ी बहन ने बताया - क्या बताऊँ अभिलाष जी एक पेज पढ़ने के बाद ही मेरा सर दर्द करने लगा। ये तो छोटी ने इसको रात - रात भर जग के पढ़ी है। मोबाइल की रोशनी जला कर।
मैं छोटी वाली की तरफ देख कर मुस्कुरा दिया। उनके चेहरे पर भी मुस्कान थी। उसके बाद उपन्यास पर चर्चा होने लगी।।
अब ये रोज़ का सिलसिला हो गया। उपन्यासों के जरिये हमारी दोस्ती आगे बढ़ रही थी। उपन्यास इस दोस्ती में सूत्रधार बन रहे थे।
हम दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। वह मेरे बारे में क्या सोचती ये तो मुझे आज तक पता नहीं चला। पर मेरे दिल के किसी कोने में एक मीठी घन्टी बजी थी।
एक दिन उन्होंने बताया कि वह कविताएं लिखती हैं। तभी पीछे से उनकी बड़ी बहन ने कहा - अभिलाष जी दो डायरी लिख के रखी है।
मेरे मुँह से केवल एक शब्द निकला - अरे वाह! क्या बात है।
मैंने उनसे कहा - क्या आप अपनी कविता मुझे नहीं देंगी पढ़ने?
उनकी बड़ी बहन ने कहा - किसी को नहीं दी है पढ़ने। सिर्फ मैंने पढ़ी है।
यह सुनकर मैंने कहा - अगर कोई बात है तो कोई दवाब नहीं है डायरी देने की।।
अगले दिन वह डायरी मेरे बैग में थी। उनकी बड़ी बहन ने हँसते हुए कहा - अरे वाह अभिलाष जी! आप तो नसीब वाले निकले। आप मेरे बाद दूसरे इंसान है जो इस डायरी को पढ़ने वाले हैं। मुझे तो उतना समझ नहीं आया। लेकिन अच्छा लिखती है। पढ़ के बताइएगा।
वह डायरी तकरीबन मैंने 1 महीने अपने पास रखा था। मैंने सारी कविता पढ़ डाली थी।
मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। केवल यही दिमाग में था कि कितना टैलेंट है इस लड़की है। अगर अपने दिल पर हाथ रखूं तो यही कविताएं मुझे लेख़क बनने की प्रेरणास्रोत थी और है।
मैंने उन्हें डायरी वापस कर दिया। केवल एक शब्द कहा - लिखना छोड़ना मत!
।।
4 महीने का कोर्स था। जो अब ख़त्म होने वाला था। क्लास खत्म होने से एक हफ्ते पहले ही मैं क्लास छोड़ने वाला था। ये बात पूरे क्लास को पता थी। जिस दिन मेरा अंतिम क्लास था, वह एक सादा  कॉपी मेरे पास लेकर आयी और कहा - अभिलाष आप इसपर अपना ऑटोग्राफ दीजिये।
मेरा मुँह खुला रह गया था। मैंने उनसे कहा - मैंने जीवन में ऐसा कोई बड़ा कार्य नहीं किया है। जो आप मेरे ऑटोग्राफ लें।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा - आप बहुत अच्छे इंसान है। आप बहुत आगे जाएंगे।
मैंने अपना ऑटोग्राफ दे दिया। जीवन का पहला ऑटोग्राफ दिया था मैंने।
ऑटोग्राफ लेने के बाद उन्होंने कहा था - इसे जीवनभर अपने पास रखूंगी।।
पीछे उसके बड़ी बहन का हो - हो सुनाई दे रहा था। जाते - जाते उन्होंने अपना नंबर मुझे दिया। उन दिनों लड़कियों के नंबर मिलना पारस पत्थर मिलने जितना बराबर था।
।।
मैं जा चुका था।
अब हमारी दोस्ती फ़ोन पर नया रूप ले रही थी। उनके बर्थडे पर सबसे पहले मैसेज भेजना और मेरे बर्थडे पर उनका सबसे पहले मैसेज आना।
इसके बाद मैं पढ़ाई के लिए बंगाल चला गया। लेकिन संपर्क कभी टूटा नहीं। दोस्त थे और आगे भी दोस्त रहे।
अवसाद के दिनों में भी वह हिम्मत देती रहीं। पटना वापस आने के बाद 6-7 महीनों में एक - आध बार पार्क में मिलने चला जाता था। जिस बेंच पर हम बैठते, उसके एक सिरे पर हम दूसरे सिरे पर वह। और बोलने के लिए कुछ भी नहीं।
अवसादों ने मुझे लेख़क बना दिया। और इसी दौर में वह साहित्य से दूर हुई। या यूँ कहें , हम दोनों एक दूसरे से दूर हुए। उन्हें अपनी भविष्य ठीक करनी थी। और मैं खुद को साहित्य के सागर में झोंकने को तैयार था।
हमारी दोस्ती सिर्फ एक फॉर्मेलिटी बन कर रह चुकी थी। उनके मन में क्या था , ये कभी जान सका। खुद हिम्मत कर के कभी बोल या कुछ पूछ नहीं सका।
आज हमारी फ्रेंडशिप डे है। सिर्फ एक व्हाट्सएप मैसेज...☺️

।।
अंत में आप सब ये जरूर सोच रहे होंगे मैंने कुछ बोला या पूछा क्यों नहीं।
तो इसका जवाब ये है-
“ये बिहार है,
और हमारी जातियाँ अलग थी”।।

Monday, March 11, 2019

लेख्य-मंजूषा त्रेमासिक कार्यक्रम (मार्च 2019)

“मौन ही मेरी भाषा है, दूर क्षितिज तक जाती है।
संकुचाता हूँ, घबराता हूँ, जो दिल में आता है वह बताता हूँ"।
 
उक्त बातें वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय राश दादा राश ने लेख्य-मंजूषा के त्रैमासिक कार्यक्रम में कहीं। अपने उद्बोधन में उन्होंने बताया कि कविता मंच से निकले और श्रोता के दिल तक पहुँचे वही कविता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आदरणीय डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने अपने उद्बोधन में मंच पर उपस्थित सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि लेख्य-मंजूषा दिन दोगुनी रात चौगुनी अपने विकास पथ पर बढ़ रही है। कार्यक्रम की प्रतियोगिता पर रौशनी डालते हुए कहा कि प्रतियोगिता का अर्थ आपसी विवाद न हो कर साहित्य सृजन का कार्य होता है। इस बार प्रतियोगिता की रूपरेखा से उत्कृष्ट रचना सामने आयी हैं।
कार्यक्रम में बिहार साहित्य सम्मेलन के अध्य्क्ष डॉ. अनिल सुलभ ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य की साधना सबसे बड़ी तपस्या है। निराशा से घबराना नहीं है। काव्य शिल्प पर रौशनी डालते हुए उन्होंने बताया कि छंद युक्त कविताएं अधिक खूबसूरत बनते हैं। जबकि छंदमुक्त कविता में प्रभाव रखना अत्याधिक मुश्किल होता है।
लेख्य-मंजूषा के त्रैमासिक कार्यक्रम (मार्च 2019) “शब्द - प्रबंधन : साहित्य - सृजन” के तहत बैंगलोर से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय राश दादा राश मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार व लघुकथा के पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा अनेकानेक तांका का पाठ किये।
दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। शुभारंभ के बाद लेख्य-मंजूषा की त्रैमासिक पत्रिका “साहित्यक स्पंदन” का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण के वक़्त मंच पर डॉ. सतीशराज पुष्करणा, राश दादा राश, विभा रानी श्रीवास्तव, नसीम अख्तर, डॉ. अनिल सुलभ, कृष्णा सिंह, भगवती प्रसाद द्विवेदी, इत्यादि मौजूद रहे।
“शब्द-प्रबंधन:साहित्य-सृजन”
साहित्य में उच्चारण का अपना विशेष महत्व है। उच्चारण में कोई त्रुटि न हो इसके लिए लेख्य-मंजूषा के सदस्यों का 6-6 सदस्यों का 5 दल बनाया गया। दल दुष्यंत, दल नागार्जुन, दल दिनकर, दल निराला व दल प्रेमचंद नाम से बनाए गए। अस्थानीय सदस्यों के रचनाओं का पाठ स्थानीय सदस्यों ने किया।
शायर सुनील कुमार की अगुवाई में दल दुष्यंत ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। क्रमशः दल निराला, दल प्रेमचंद , दल नागार्जुन व दल दिनकर ने द्वितीय , तृतीय, चतुर्थ और पाँचवा स्थान हासिल किया।
धन्यवाद ज्ञापन शायर सुनील कुमार ने किया। कार्यक्रम में बिहार साहित्य सम्मेलन के अध्य्क्ष डॉ. अनिल सुलभ, वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षाविद डॉ. ध्रुव कुमार, आलोचक व कवयित्री प्रो. डॉ.अनिता राकेश, समाजसेवी ममता शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार नीलांशु रंजन, जे.पी. मिश्रा, जवाहर लाल प्रसाद, इत्यादि की उपस्थिति गरिमामय रही।
*–कृष्णा सिंह-* जमाना याद रखे जो,
कहानी हो तो ऐसी हो,
लुटा दें देश पर अपनी,
जवानी हो तो ऐसी हो।
*–डॉ. सतीशराज पुष्करणा–* जो बेशर्म है
दुनिया में वही तो
है कामयाब
चापलूसी का दौर
सच की कहाँ ठौर
*-सुनील कुमार-* ग़ज़ल हो तुम मेरी जाना तुम्हें ही गुनगुनायेंगे
तुम्हारे प्यार में जानम हरिक ग़म भूल जाएंगे
*-शशि शर्मा खुशी-* साँसों की डोर जब,
छोडने लगती है तन का साथ
याद आने लगता है बीता कल
मन लगाने लगता है हिसाब
क्या खोया क्या पाया?
*–प्रेमलता सिंह–* कानून के शिकंजे में
आने के बाद भी
उस शैतान के चेहरे पे
कुटिल मुस्कान देखकर
मेरे तन- बदन में
आग लग जाती है
तब लिखती हुँ-
मैं कोई कवयित्री नहीँ।
अंकिता कुलश्रेष्ठ– चेतना हीन मानव विषाक्त
अमृत संदेश सुनाना है
मानवता का है धर्म प्रेम
ये जन-जन को समझाना है
सुबोध कुमार सिन्हा– धान के बिचड़े सरीखे
मालूम नहीं सदियों पहले
कब और कहाँ से / लाँघ आए थे गाँव की पगडंडियों को पुरखे मेरे
शुशांत सिंह– एक सफ़र हुआ महबूब संग अनजानों की तरह
पर हम याद रखेंगे सालों साल दीवानों की तरह
मीरा प्रकाश– सड़क से गुजरते हैं हम
तो एक नजर देख लेते हैं उधर भी
उस फुटपाथ पर मेरी नजर चली ही जाती है
जहां हालात से हारे , बेहालात वाले लोग रहते हैं।
वीणाश्री हेम्ब्रम– कुछ शब्द है कुछ मौन है ,अगर समझो तो
तुम्हारे लिए है ये, अगर समझो तो
नहीं जरूरत कोई शब्दों के व्याकरण देखने की।
वेदना समझ लेना ..बस ,मेरे क्षुब्ध ह्रदय की।
सुनना शब्दों के पीछे का मौन, नीरसता प्रलय सी।
अगर समझो तो.....
-साधना ठाकुर– पता नहीं आईने के सामने
कौन था ?
और आईने में अक्स किसका था ?
माँ तो इधर भी थी
माँ तो उधर भी थी
तन्हा वो भी थी
तन्हा मैं भी हूँ
संजय कुमार 'संज'– फागुन वाला प्यार
सखी रे, फागुन वाला प्यार
कच्ची धूप महुआ का डेरा
अंजुरी भर-भर प्यार
पियरी सरसो का है घेरा
फागुन वाला प्यार
प्रभास सिंह– कभी देखा है! माँ गंगे के चरणों में पड़ी हुई, आस्था से उत्पर्ण व्यर्थ वस्तुओं को..
–अमृता सिन्हा– "ओ भारत माँ के अमर शहीदों,
हम कैसे नमन करें तुम्हारा,
कैसे क़र्ज़ चुकाएंगें हम
हो कैसे सफ़ल बलिदान तुम्हारा"
सरोज तिवारी– पाक तेरा नापाक इरादा और न बढ़ने देंगे हम
दहशतगर्दी में सेना को और न मरने देंगे हम
तेरी कायरता की बलि पर देश हमारा मौन रहा
ओ जल्लादों अब जघन्यता और न करने देंगे हम
डॉ. रबबान अली– दामन बचा के चले गए तुम
आँसुओ का ज्वार क्यू छोड़े जाते हो
पास न आओगे फिर कभी
यादों का संसार क्यो छोड़े जाते हो
–सुधांशु कुमार–
समय से बगावत कर,
कब तक जीते रहोगे,
सुलगती आग भी,
ठंडी हो जाती है,
जब तक उसे ,
हवाओं की
आंच न मिले।"
पम्मी सिंह'तृप्ति'–"भीड़ तंत्र पर बात चली हैं,एक छत के खातिर
बेरोजगार भटके युवकों की राह बदली हैं,
आह,वाह,अना,अलम और आस्ताँ के आस में
आजकल हुजूम की कारोबार खूब चली हैं
अनिता मिश्रा– देखो मैं नारी हूँ, नारी का सम्मान चाहती हूँ।
कोरी बातो से ही नहीं, हृदय से मान चाहती हूँ ।
कल्पना भट्ट– यह कैसी हवा
ज़हरीली, नफ़रत से भरी
विषकन्या क्या पुनः
जीवित हो उठी है
आतंकी गलियारों में!
–सीमा रानी– मातृभूमि की चुनौतियाँ,
क्या कह रही, सुनना होगा ।
जागने का वक़्त है,
जागना और जगाना होगा।
–मीनू झा– हर बार लहू से ही मुल्क ए इबारत ना लिखते
काश! फतह ही लिखते शहादत ना लिखते
ह्रदयहीन,क्रुर, घृणित, जाहिल है ये अपना दुश्मन
भाई बनकर रहता तो सच मानो अदावत ना लिखते
मो. नसीम अख्तर– इधर शम्मे उलफत जलाई गई है।
उधर कोई आँधी उठाई गई है।
वो घर को नहीं बाँट डालेगी दिल को ।
जो दीवार घर में उठाई गई है।
–कमला अग्रवाल– नई सुबह होने तो दो,रिश्तों कीदूरी ना बढ़ओ ,कुछ तुम मान जाओ ,कुछ वे मान जायें ,ताप न रखो मन में,मनकी व्यथा को पिघलने तो दो
–मिनाक्षी सिंह– मैं आज की नारी
अपनी मर्यादा में रहकर
पुरानी कुरीतियों और जुल्मों की ,
जंजीरों को तोड़ने वाली
अपनी सहभागिता से
समाज और देश को
उन्नति प्रदान करने वाली
–अणिमा श्रीवास्तव–
पुलवामा में हुआ ये कैसा हादसा!?
धरती की हूक निकली,
आसमॉ भी था रूआसॉ।
एकता कुमारी– मैं सौ पुत्रों की माँ बनना चाहती हूँ।
पर आँखों पर पट्टी बांध, गांधारी बन कर नहीं।
मैं अपने पुत्रों को कुरुक्षेत्र रण मैदान नहीं भेजना चाहती हूँ ।
मैं उन्हें देश की सीमाओं पर भेजना चाहती हूँ।
–कुमारी स्मृति–"जब रक्त गिरता है वीर का,सरहद पर गुल मुस्काता है,
गर्वित होता है ये देश सारा,तिरंगा भी झुक जाता है।"
राजेन्द्र पुरोहित– "दर्द ढोने से कुछ नहीं होगा
सिर्फ़ रोने से कुछ नहीं होगा
अब्र बरसे तो कोई बात बने
बीज बोने से कुछ नहीं होगा"
–शाईस्ता अंजुम–"रिश्ते जताने लोग मेरे घर भी आऐंगे
फल पेड़ो पर होगें तो पत्थर भी आऐंगे
जब चल पड़ी हूँ मैं सफर पर तो हौसला रखो
सहारा कही कही पे काँटे उग आऐंगे।"
ज्योति मिश्रा– मैं तो ख़ाके ग़म में ही दफ़न हूँ
मेरी गोर पे तू सदा न दे
हूँ बुझा हुआ सा च़राग मैं
मेरे पास आके हवा न दे।
संजय कुमार सिंह– गहरी नदी में नाव की तरह,
तपती दुपहरी में छांव की तरह,
रूह को सुकून देती हो,
लगती हो बिलकुल मेरे गाँव की तरह ।


रिपोर्ताज़
अभिलाष दत्ता 

Sunday, November 11, 2018

समय का फेर..

इंसान की प्रवृति होती है, वह कभी भी एक चीज़ में खुश नहीं हो पाता है। वह हमेशा बदलाव खोजते रहता है। हम सब इस प्रक्रिया से गुजरते हैं। अधिकांश समय, लोगों से सुनते हुए मिल जाता है, “छुट्टी मिले तो कही घूम के आया जाए”।
लोग अपने दिनचर्या वाले जीवन से बहुत जल्दी ऊब जाते हैं।
नयेपन और शांति की तालाश में यूरोप के बहुत लोग साल भर के बचाए हुए पैसों से भारत और नेपाल जैसे जगह घूमने आते हैं।
वह चीज़ जिसे पाने की लालसा हो, वह मिल जाने के बाद उसका आकर्षण ख़त्म हो जाता है। जब मेरे पास काम नहीं था, तो पागलों की तरह काम ढूंढ रहा था। उस अज्ञातवास के दिनों में लिखने की आदत लग गयी।  काफी सारी कहानियां लिख डाली। दो-तीन उपन्यास का प्लाट तक तैयार कर लिया था।
लेकिन, यह मेरी मंज़िल नहीं थी। मुझे नौकरी चाहिए थी। नौकरी मिली भी तो अपने पसंद लायक मिल गयी। पत्रकार की नौकरी। रोज़-रोज़ कुछ न कुछ लिखते ही रहना है। पर हुआ क्या? हर इंसान की तरह आकर्षण खत्म हो गया। 10 से 7 बजे की नौकरी। घर आते - आते आदमी बेड पर थक के बेहोश। सुबह आफिस के लिए देर न हो तो इसलिए आदमी सड़क पर इंसान हो कर रोबोट बन गया होता है। मुझे याद है 2015 का दुर्गापूजा मैं दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) में था। मुझे पटना की बहुत याद आ रही थी। मन मसोस कर मैं दुर्गापुर में रह गया। होमटाउन पटना होने के कारण होम सिकनेस थी। लेकिन तीन साल में ही ऐसा क्या हुआ जो 2018 के दुर्गापूजा में अपना टिकट धनबाद करवा लिया। बेशक पटना मेरा अपना है, लेकिन दूसरों की तरह मैं भी ऊब चुका था। इसलिए दुर्गापूजा जैसे पर्व में पटना छोड़ कर धनबाद गया। नयापन और शान्ति के खोज में।
आज  मुझे नौकरी मिल चुकी है। रोज़ लिख भी रहा हूँ। लेकिन जो मैं लिखता था, वह नहीं लिख पा रहा हूँ। तीन उपन्यास और दो कहानी का प्लाट पिछले एक साल से दिमाग में चल रहा है। लिखा कितना है “जीरो"।
अब तो दिमाग यह भी सोचने लगा है, कहीं नौकरी पाने के चक्कर में मैंने अपने आप को खो दिया क्या? मुझे कहानीकार या उपन्यासकार बनना था। क्या बन गया 9 घण्टे काम करने वाला कर्मचारी या रोबोट। जो घर आता है तो सो जाता है। सुबह फिर भागता है।
यह इंसान अब नौकरी से भी ऊब रहा है। क्योंकि मुझे अपने सारे काम खत्म करने है। बाकी बचे रचनाओं को खत्म करना है। उसके लिए समय चाहिए।
मेरी किताब आने वाली है। जानबूझकर कर मैं उसमें देरी करवा रहा हूँ। क्योंकि मेरा दिमाग अभी शांत नहीं है।
सब समय का फेर है।।
देखते है कब तक अपना बचा हुआ प्रोजेक्ट खत्म कर पाऊंगा?
i. परिकल्पना - दूसरा रक्षक (उपन्यास का दूसरा भाग)
ii. बदला-प्रचंड है ( कहानी)
iii. पहली सैलरी (कहानी)
iv. साइड A & साइड B (दूसरा उपन्यास)
v. छः रास्ते... (तीसरा उपन्यास)

Thursday, November 8, 2018

भोजपुरी फिल्मों का सफ़र....

बचपन में हम सब अपने स्कूल के पुस्तक या किसी  सामान्य ज्ञान के पुस्तक में यह जरूर पढ़ें होंगे, पहली भोजपुरी फ़िल्म - ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’। 
poster of first bhojpuri film

पर कितनों ने देखा है?
पिछले 9 साल से विश्व संवाद केंद्र बिहार की स्क्रीनिंग सोसाइटी, ‘पाटलिपुत्र सिने सोसाइटी’ के तरफ से हर शनिवार को एक फ़िल्म बड़े पर्दे (प्रोजेक्टर) पर फ्री में दिखाई जाती है। मकसद साफ है, बिहार की जनता में अच्छी फिल्में देखने का रुझान पैदा हो। फ़िल्मो का ज्ञान विकसित हो, ताकि दर्शक अच्छी फिल्में और बुरी फिल्मों में अंतर स्पष्ट करना जान सके।
screening of first bhojpuri movie in VSK Hall on 03.11.2018

इसी क्रम में पिछले शनिवार 03.11.2018 को पहली भोजपुरी फ़िल्म  ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’  प्रदर्शित की गई। 1963 में आई पहली भोजपुरी फ़िल्म एक घण्टे छियालीस मिनट की है। फ़िल्म को निर्देशित किया था कुंदन कुमार जी ने, कहानीकार और पटकथा लेखन नाजीर हुसैन ने किया। फ़िल्म को संगीत दिया चित्रगुप्त और शैलेंद्र ने। मुख्य कलाकार में कुमकुम, असीम कुमार इत्यादि थे।  
फ़िल्म में भोजपुरी अपनी मिठास के साथ परोसी गयी है। उस ज़माने में विधवा विवाह जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे को लेकर फ़िल्म बनाना वाक़ई एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।  नायक-नायिका के प्यार को दिखाने के लिए दो पत्तों का मेल दिखाना उस ज़माने में ‘बिम्ब’ के इस्तेमाल को दिखाता है। सिनेमा से जुड़े लोग बिम्ब शब्द का अर्थ जानते होंगे। समाज का क्रूर रूप से नायक-नायिका का जुदा होना। नायिका का दूसरे से विवाह होना। विवाह उपरांत विधवा होना। फ़िल्म की कहानी यहाँ तक सामान्य ही लगती है। दूसरे हॉफ में फ़िल्म गहरे मोड़ पर खड़ी नज़र आती है। विधवा से कोठे की रौनक बनी फिल्म की नायिका का सामना जब अपने पागल बाप से होता है। उस समय नायिका के संवाद दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है, ‘एक वेश्या सभ्य समाज की देन होती है’। 
कहानी सुखद अंत पर खत्म होती है। लेख़क और निर्माण अपने दर्शकों के मन और दिमाग पर कोई बोझ नहीं डालना चाहते थे। इसलिए फ़िल्म सुखद अंत पर खत्म होती है। दर्शक पहले ही काफी दुख झेल चुके हुए रहते हैं। इस फ़िल्म में आपको शोले फ़िल्म की ‘मौसी' भी देखने को मिलेगी।
1963 में बने इस फ़िल्म का अच्छा प्रिंट मिलना बहुत ही मुश्किल है। यह कमी जरूर महसूस हुई। किसी - किसी दृश्य में संवाद पर फ़िल्म का संगीत हावी होते हुए सुनाई देता है। फ़िल्म की ज्यादातर हिस्सों की शूटिंग बिहटा के आसपास हुई है। फ़िल्म में 60 के दशक का आरा स्टेशन, पटना स्टेशन, पटना का गोलघर इत्यादि देखने को मिलता है। उस वक़्त पटना की सड़कों पर बग्गी अधिक देखने को मिलती थी।
फ़िल्म के गीतों को आवाज़ स्वर कोकिला लता मंगेशकर और स्व. मोहम्मद रफी जी ने दिया था।
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कोई भी सिने सोसाइटी में फ़िल्म देखने का सबसे बड़ा फायदा यही होता है, कि फ़िल्म देखने के बाद सदस्यों के द्वारा फ़िल्म पर एक खुली चर्चा होती है। इस तरह के चर्चा से काफी अंदर की जानकारी बाहर निकल कर आती है। एफ़टीआईआई के प्रोफेसर महेश ड्रिग्राजकर अपने तीन दिवसीय पटना दौरे में कहा था, “फिल्में हमेशा बड़े पर्दे पर या स्क्रीनिंग सोसाइटी में ही देखनी चाहिए”। देखने के बाद उसपर चर्चा जरूर होनी चाहिए। चर्चा होने से ज्ञानवृद्धि भी होती है और हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ता है। 
open discussion

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फ़िल्म खत्म होने के बाद इस फ़िल्म की भी चर्चा शुरू हुई। पता चला फ़िल्म की कहानी 1950 के लगभग तैयार हो चुकी थी। उस दौर में हर क्षेत्रीय भाषा की फिल्में बन रही थी। इसी बीच बिहार की आञ्चलिक भाषा से फिल्म निर्माण की अवधारणा सबसे पहले अभिनेत्री नरगिस की माँ जद्दनवाई की थी। मूलतः वाराणसी की रहने वाली जद्दनवाई ने इस संदर्भ में वाराणसी के ही प्रख्यात हिन्दी फिल्मों के खलनायक कन्हैयालाल से सर्म्पर्क किया। श्री लाल ने अपने मित्र और हिन्दी फिल्मों के चरित्र अभिनेता व लेखक नाजीर हुसैन को इसके लिए प्रेरित किया।
इसके बाद सन 1960 में राजेंद्र बाबू (स्व. डॉ. राजेंद्र प्रसाद) को इस फ़िल्म की कहानी सुनाई गई। उसके बाद राजेन्द्र बाबू के आग्रह पर इस फ़िल्म का निर्माण शुरू हुआ। 
दो साल अथक प्रयास के बाद अपनी मिठास लिए पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’ बन के तैयार थी। इसकी पहली स्पेशल स्क्रीनिंग राजेन्द्र बाबू के लिए सदाकत आश्रम में की गई। इसके बाद 22 फरवरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में रिलीज़ की गई। पूरे पाँच लाख में बनी फ़िल्म उस जमाने में तीस लाख की कमाई की थी।
भोजपुरी फ़िल्मो का वह स्वर्णिम दौर था। उसके बाद भोजपुरी में फिल्में लगातार आने लगी। भोजपुरी भाषा की दूसरी फिल्म “बिदेशिया” आयी। इस फ़िल्म ने भी सफलता के झंडे गाड़े। 62 से 70 के बीच भोजपुरी फ़िल्म पूरे देश में प्रसिद्ध हो रही थी। उसके बाद इसमें थोड़ी सी गिरावट देखने को मिली। सन 1980 में आई भोजपुरी फ़िल्म “दंगल” ने भोजपुरी भाषा को उठाने का काम तो किया, लेकिन अधिक सफल नहीं हो सका। उसके बाद भोजपुरी फिल्मों को लोग भूलते चले गए। 
उसके बाद दौर आया 2004 का जिसमें मनोज तिवारी अपनी पहली फ़िल्म “ससुरा बड़ा पईसावाला” लेकर दर्शकों के बीच आएं। वह फ़िल्म सफलता का परचम लहरा दिया। उसके बाद भोजपुरी भाषा में अभी तक फ़िल्मो का बनना जारी है। इन सब के बीच सोचने की बात है वर्तमान में बनी भोजपुरी फिल्में और 1963 क दशक में बनी पहली भोजपुरी फ़िल्म में क्या अंतर है? 
हमने अपने जड़ को भुला दिया। उस दौर में गीत लिखे जाते थे ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो, साइयाँ से कर दे मिलनवा’, आज लिखे जाते हैं ‘पियवा से पहले हमार रहलु’। भोजपुरी के स्वर्णिम दौर में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जी जैसे गायक अपनी आवाज़ देते थे। जिसे पूरा देश गुनगुनाता था। आज के भोजपुरी गीतों को हम सबके सामने गा भी नहीं सकते हैं। वह दौर था जब भोजपुरी फ़िल्म को देखने के लिए लोग बैलगाड़ियों में बैठकर आते थे। 
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भोजपुरी भाषा में बनने वाली फिल्मों का यह हस्र क्यों हुआ? इसके जवाब में इरशाद खान(स्क्रिप्ट-राइटर) बताते हैं, पहले फिल्में दर्शकों के हिसाब से बनती थी। आज वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटरों) के हिसाब से बनने लगी है। वितरकों को केवल पैसे से मतलब होता है, इसलिए अच्छी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुँच पाती है। वितरकों ने अपनी सोच हमारे दिमाग मे इतना डाल दिया है, कि हमने भी मान लिया है अश्लीलता ही भोजपुरी का पर्याय है। दरसल ऐसा है नहीं, हमे इस सोच से निकलना होगा। अच्छी फ़िल्मो का माँग करना होगा।
जानकारी के लिए बता दूँ, भोजपुरी की ऊंचाई आप इसी बात से लगा सकते हैं। बचपन मे सुना गीत ‘चंदा मामा दूर के' सबसे पहले भोजपुरी में गाई गयी थी। इसके बोल हैं ‘ऐ चंदा मामा आरे आवा, पारे आवा' , इसे आवाज़ दिया है  स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने। आप सब इसे यूट्यूब पर खोज के सुन सकते हैं।।।
।।।
अगले शनिवार को यानी 10.11.2018 को 1948 में बनी इटालियन भाषा की वर्ल्ड क्लासिक फ़िल्म BICYCLE THIEVES प्रदर्शित की जाएगी। इस फ़िल्म को सैकड़ो बार देखकर सत्यजीत रे फ़िल्ममेकर बने थे।
next saturday BICYCLE THIEVES



अभिलाष दत्ता 

Tuesday, November 6, 2018

दीपावली : तब और अब...




रंगोली
दीवाली आ चुकी है। आज धनतेरस है  पिछले एक हफ्ते से टालते - टालते घर में रखे भगवान मंदिर को सफाई करने में लग गया। ईश्वर के प्रति मेरी भावना शून्य है। ऐसा इसलिए नही की मैं भगवान को नही मानता हूं या कुछ। दरसल मेरे मन में श्रद्धा के भाव उत्त्पन्न नहीं होते है।
खैर, मुद्दे पर आते हैं।
कल की दीवाली और आज की दीवाली में क्या अंतर है? आज अपनापन नहीं है। मुझे याद है जब बाबा दादी थे उस समय दीवाली के समय पोता - पोतियों के मुँह से फरमाइश गिरने की देर रहती थी। अगले पल वह समान सामने मौजूद। वह दौर अलग था। संयुक्त परिवार की अवधारणा हुआ करती थी। घर के सभी लोग नए कपड़े खरीदते थे। सब मिल कर दीवाली की तैयारी महीनों से लग जाते थे। बच्चें दिन - दिन भर धूप में पठाके डाल कर उसकी रखवाली भी करते थे। भारतीय परंपरा ने हमें ये दिमाग में डाला बहने साफ- सफाई में माँ चाची की हाथ बटाएंगी। घर के लड़के पापा चाचा के साथ मार्केटिंग की जिम्मेदारी होती थी। वह अलग बात है असली मार्केटिंग मम्मी - पापा ही जा कर करते थे। उन्हें घर का बजट पता रहता था। उस बजट में भी वह सबके पसंद की सामग्री ले आते थे। खुशियों का त्योहार हुआ करता था दीवाली। पटाखों का भी वर्गीकरण भारतीय परिवारों में देखने को मिलता था। छोटे बच्चे बीड़ी बम, बड़े भैया हाइड्रो बम, उसके बाद पूजा कर के आंगन में आई घर की महिला मंडली। पापा और चाचा की जिम्मेदारी होती थी, महिलाओं के लिए अनार, चकरी , छुरछुरी जैसे पटाखे बचा के रखें। घर में नई बहू आयी है तो उनके लिए भी हाइड्रो बम बचा के रखना होता था। नयी भाभी या नयी चाची घर के बच्चों के साथ पहले आवाज़ वाले बम का मजा फिर तस्वीर के लिए सभी के साथ अनार और चकरी। यह क्रम चलते रहता था। दूसरे दिन घर के बच्चे जल्दी उठ कर मुआयन पर निकलते थे। रात में कौन - कौन सा पटाखा नहीं जला उसे खोजा जाए।
अब सब कुछ बदल गया है। बाबा दादी वाली पीढ़ी कब की खत्म हो गयी। अब उनका जगह माँ - पापा लोग ले चुके हैं। लेकिन उन्हें पोता - पोतियों का सुख प्राप्त नही है। मेरे जानकारी में एक सिन्हा जी है सरकारी डॉक्टर हुआ करते थे। अब अवकाशप्राप्त है। बेटा सब पढ़ के जेंटलमैन हुए तो दूसरे राज्यों में चले गए। छुट्टी मिलती नहीं है। इसी बीच सिन्हा जी से भेंट हुई। किसी बिजली मिस्त्री से अपने बंगले पर लाइटिंग करवा रहे थे। खूबसूरत बंगला उजले रंग का उसी रंग का लाइटिंग। लेकिन देखने वाला कौन? सिर्फ सिन्हा जी और उनकी धर्मपत्नी। 
।।।
बचपन में मुझे पटाखों से बहुत लगाव था। बाबा सबके पसंद के पटाखे लाते थे। मुझे वह साँप वाला बहुत पसंद था। जिसमें माचिस लगाने से उसमें से सांप की आकृतियां निकलती थी। उसमें धुंए की मात्रा की अत्याधिक रहती थी। धीरे - धीरे युवावस्था में आने लगा। 2013 में घर बटवारें का एक अजीब सा धक्का लगा। उसके बाद से सब पर्व से ही मन उचट सा गया। क्या दीवाली - क्या होली? सब एक जैसा। 
इन वर्षों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। घर का सबसे ज़िद्दी लड़का का तमगा मिला हुआ था। आज दीवाली के दिन घर सफाई में लगा हुआ है। मंदिर साफ - सफाई उसे सजाना। फिर दोपहर दो बजे से रात के नौ बजे तक दीवाली की अकेले खरीददारी करना। धनतेरस पर एक कटलरी सेट खरीदा। मुझे तो यह भी नहीं पता था उसे कटलरी सेट बोला जाता है। 
कटलरी सेट 
अकेलापन काफी कुछ सीखा देता है जीवन में। बेटा के साथ - साथ घर की बेटी भी बन जाता हूँ। 
खैर अब पुरानी कड़वाहट को भुला कर सब एक हैं। फिर भी कहीं - कहीं उसके अंश मौजूद है। 
पटाखे अंतिम बार कब फोड़े थे, यह बात स्मृतिपटल पर विलुप्त हो गयी है। वह कहते हैं ना आप जिस परिस्थिति में होते हैं, आप उसी में ढलने लगते हो। मेरे पास बारह साल से एक झबरा ( पामेरियन) कुतिया है। मेरे लिए तो अभी भी वह मेरी बच्ची है। लेकिन सही मायने में अब वह बूढ़ी हो चुकी है। पटाखों के आवाज़ से एकदम डरी सहमी रहती है। वही स्थिति मेरे साथ है। तेज आवाज़ वालो पटाखों से मुझे भी डर लगता है। 
आज बाज़ार जाते समय कुछ बच्चें तेज़ आवाज़ वाले पटाखे फोड़ रहे थे। वह आवाज़ सुन कर मेरे मुँह से निकल गया , “कितने जाहिल बच्चें है”। वैसे बच्चें कभी जाहिल नहीं होते हैं। जाहिल वाली पंक्ति तो डर के कारण मुँह से निकल आया। 
ऊपर की पंक्ति में लिखा था, बाबा - दादी हम पोता - पोतियों की सभी माँगे पूरी कर देते थे। उस समय पैसों की अहमियत नहीं पता रहती थी। अब अहमियत पता है। इसलिए धनतेरस में मुझे जो चाहिए था मैंने मटिया दिया। मेरे लिए तो दीवाली वही टीवी रूम में टीवी देखते हुए बीत जानी है। मैं और ब्राऊनी (मेरी पालतू कुतिया) और मेरा मोबाइल। जिसमें पीयूष मिश्रा का गाना - “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है”।
।।।।
आप सभी को मेरी ओर से शुभ दीवाली। पटाखे फोड़ना है तो  जम के फोड़िये नहीं फोड़ना है तो मत फोड़िये।
घर का मंदिर की सजावट आप सब को कैसी लगी जरूर लिखियेगा।
मंदिर 


अभिलाष दत्ता

Sunday, October 28, 2018

कैथी की कथा

लिपि या लेखन प्रणाली का अर्थ होता है किसी भी भाषा की लिखावट या लिखने का ढंग। ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। लिपि और भाषा दो अलग अलग चीज़ें होती हैं। भाषा वो चीज़ होती है जो बोली जाती है, लिखने को तो उसे किसी भी लिपि में लिख सकते हैं।
आज के समय में बहुतायत लिपि विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्तप्राय की ओर अग्रसर हैं। इतिहास के पन्नो में बिहार लिपि के नाम से प्रसिद्ध कैथी लिपि आज पूरे विश्व से विलोपन के कगार पर पहुँच चुकी है। कैथी लिपि की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कालांतर में इसे कायस्थों की लिपि कहा जाने लगा। पर इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं प्राप्त होते हैं।
कैथी लिपि की विशेषता यह थी उसमें ऊपर की ओर लकीरें नहीं होती थी। यह एक तरह से शॉर्टहैंड लिपि थी। इसे बाएं से दाएं की ओर लिखी जाती थी
कैथी लिपि का इतिहास” नामक किताब के लेखक  भरैव लाल दास ( ग्राम - रौतपार ) बताते हैं , की सामान्यतः आज के समय में कैथी लिपि को मैथली लिपि मान लेते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। मिथिलाक्षर की अपनी एक अलग लिपि है, और कैथी एक अलग लिपि है।
बी.एल. दास कैथी लिपि के इतिहास के बारे में बताते हैं इस भाषा की उतपत्ति ग्यारहवीं शताब्दी में हुई थी। इसका नाम कैथी क्यों पड़ा इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं हैं।
लिपि के इतिहास में सबसे पहले ब्राह्मणी लिपि उसके बाद खरोष्ठी लिपि आती है। उसके बाद कुटिलाक्षय लिपि का आगमन हुआ। कुटिलाक्षय लिपि के बाद कैथी लिपि की शुरुआत हुई। कैथी लिपि का क्षेत्र काफी दूर तक फैला हुआ था। पूरा बिहार, बंगाल के मालदा, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश तक इस लिपि को जानने वाले लोग मौजूद थे। उस समय कैथी लिपि से ही मगही, भोजपुरी, मैथली, अंगिका, बज्जिका एवं खड़ी भाषा लिखी जाती थी।
भैरव लाल दास 
विद्वानों की लिपि संस्कृत थी। उस समय साक्षरता काफी कम थी। इस कारण कैथी लिपि का उपयोग सिर्फ साक्षर लोग कर पाते थे। विद्यालयों में इस लिपि की पढ़ाई करवाई जाती थी। हर साक्षर लोग इस लिपि को जानते थे।
1540 में शेर शाह सूरी को यह समझ में आ चुका था कि कैथी एक जनलिपि है। इस बात को ध्यान रखते हुए उसने दो कर्क की व्यवस्था की , जिसे कार्कऊम कहा गया। एक कार्कऊम का काम था दो रैयतों के बीच भूमि सम्बंधित दस्तावेज को कैथी लिपि में तैयार करना। दूसरे कार्कऊम का कार्य था मालजुगारी भत्ता को फ़ारसी लिपि में तैयार करना।

उसके बाद भारत में अंग्रेजो का अधिपत्य हो गया। 1890 ईसवी में कैथी लिपि को ख़त्म करने का कुचक्र चलाया गया। जबकि 1880 में एक अंग्रेज ग्रिडसन ने कैथी लिपि का फॉन्ट तैयार करवाया था। अंग्रेजों की फुट डालो और राज करो कि नीति पर अंग्रेजो ने यह अपवाह फैला दी कि यह सिर्फ कर्ण कायस्थों की लिपि है। उस समय बही खाता देखने का कार्य कायस्थों का होता था।
अंग्रेजो ने आम लोगों के दिमाग में यह डालना शुरू किया कि कायस्थ इस लिपि का फायदा उठा कर बही खाते में कुछ भी लिख देते हैं। जिसे आम जनजीवन पढ़ने में असमर्थ रहते है।  इस बात को तूल देते हुए ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने इसका विरोध सबसे पहले किया। उस वक़्त ब्राह्मणों और कायस्थों में छतीस का आंकड़ा होता था। 1930-1935 आते - आते यह लिपि खत्म होने के कगार पर आ चुकी थी। आज़ाद भारत का पहला सेन्सस रिपोर्ट 1952 में आया जिसमें कैथी लिपि का कहीं भी जिक्र नहीं था। ( स्रोत - कैथी लिपि का इतिहास - लेखक बी.एल. दास )
यूनेस्को अपने रिपोर्ट में लिख चुकी है , “जब एक लिपि विलुप्त होती है, तो उसके साथ - साथ एक पूरी संस्कृति और इतिहास विलुप्त हो जाती है"। कैथी का इस तरह अचानक खत्म हो जाना एक बहुत बड़ी मुसीबत बन के सामने आने वाली थी।
इस लिपि को जानने वाली पीढ़ी ने अपने आने पीढ़ी को इस लिपि से अवगत नहीं करवाया। और न ही इस लिपि में रखे दस्तावेजों को दूसरे लिपि में अनुवाद करवाया।
भारत में सबसे अधिक विवादित जमीन बिहार में है। इसका मुख्य कारण है कैथी लिपि। जमीन के सभी पुराने कागज़ात कैथी लिपि में है, जिसे पढ़ने वालों की संख्या न के बराबर है। 50%-80% तक पूरखों की ज़मीन के कागज़ कैथी लिपि में है।
जमीन से जुड़ा कोई भी विभाग इन कागज़ों को नहीं पढ़ पाता है। न बैंक इन कागज़ों को देख कर लोन दे पाती है। न ही ज़मीन विवाद के मामले में न्यायालय न्याय कर पाता है।
बी.एल. दास बताते हैं बिहार में तंत्र मंत्र की किताबें, लोक गीत यहाँ तक कि सूफी गीत भी कैथी लिपि में लिखी जा चुकी है। राजेन्द्र प्रसाद अपने पत्नी को कैथी लिपि में ही चिट्ठी लिखा करते थे। भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्र को जानना है तो आपको कैथी जानना होगा। कर्ण कायस्थ के पँज्जी व्यवस्था की मूल प्रति भी कैथी लिपि में दरभंगा महाराज के संग्रालय में सुरक्षित है।
कैथी लिपि के संरक्षण के बात पर  बी.एल. दास कहते हैं , संकरक्षण से पहले हमें एक बार इसके इतिहास को देखना होगा। 1826 में कैथी लिपि में बाइबिल प्रकाशित हुई थी। बाद में यही अँग्रेजी हुकूमत ने इसके खिलाफ लोगो मे विद्रोह की भावना जागृत की। कैथी लिपि को कर्ण कायस्थों की लिपि मान कर सबसे पहले पहले विरोध करने वाले ब्राह्मण भी इस लिपि में लिखते थे। सन 1917 में चंपारण आंदोलन में राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी के साथ कैथी लिपि में पत्राचार किया था। राजकुमार शुक्ल जाति के ब्राह्मण थे। मुस्लिम, हिन्दू और क्रिश्चयन तीनों इस भाषा के जानकार थे। यह पूर्ण रूप से झूठ था कि इस लिपि के जानकार सिर्फ कर्ण-कायस्थ हैं।
कैथी लिपि 
कैथी लिपि को कैसे बचाया जाए इसके लिए  बी.एल. दास जी ने 2007 - 2009 तक इसपर अध्यन किया। उसके बाद 2010 में “कैथी लिपि का इतिहास” नामक पुस्तक प्रकाशित करवायी। इस किताब में कैथी लिपि का इतिहास, कैथी का विकास यात्रा, कैथी लिपि को लेकर जो भ्रांतियां है उसके बारे जानकरी है।
2010 के बाद बी.एल. दास ने प्रण कर लिया इस लिपि को मरने नहीं देना है। कैथी लिपि से जुड़े तमाम दस्तावेजों को उन्होंने अनुवाद करना शुरू किया। एक हज़ार लोगों को मुफ्त में इस लिपि का ज्ञान देने का संकल्प कुया। आज के समय में वह तीन सौ पचास से अधिक लोगों को इस लिपि का ज्ञान दे चुके हैं। पटना के पुरातत्व विभाग में इस लिपि के जानकार हो इसका प्रयास हो रहा है। “सी- डैक” पुणे में कैथी लिपि का फॉन्ट कंप्यूटर पर विकसित हो सके इसके लिए बी.एल. दास जी वहाँ के संकरक्षक मंडल में भी शामिल है।
मिथिला यूनिवर्सिटी में इसकी पढ़ाई शुरू हो चुकी है। पटना यूनिवर्सिटी भी इस लिपि की पढ़ाई शुरू करने पर विचार कर रही है।
बी.एल. दास के अथक प्रयास से बिहार में ज्यूडिशियल परीक्षण में कैथी लिपि का परीक्षण की शुरुआत हो चुकी है। बिहार सरकार इसे अपनी राज्य लिपि घोषित कर दे , इसके लिए वह काफी मात्रा में बिहार सरकार को पत्र लिख चुके हैं।


इतने प्रयासों के बावजूद भी पटना के एक भी पुस्तकालयों में कैथी लिपि की किताबें नगण्य स्थिति में है। द्वारिका प्रकाशन के तहत बी.एल. दास जी की किताब  प्रकाशित हुई थी। आज के समय उस प्रकाशक के पास भी किताब की एक प्रति भी मौजूद नहीं है।