Thursday, July 26, 2018

तुम मिलों तो सही

साल 2018 के पहले शनिवार , दिनांक 06|01|2018 को , “विश्व संवाद केंद्र” में “पाटलिपुत्र सिने सोसाइटी” के तरफ से बॉलीवुड फिल्म “तुम मिलों तो सही” ( 2010 ) का प्रसारण किया गया । फ़िल्म के मुख्य किरदार में नाना पाटेकर , डिंपल कपाड़िया थे । साथ में सुनील शेट्टी भी इस फ़िल्म में है ।
यह फ़िल्म विशुद्ध बॉलीवुड फ़िल्म की तरह है । बड़े - बड़े महानगरों के दर्शक इस फ़िल्म को खुद के जीवन से जोड़ कर जरूर देख सकते हैं । पर छोटे शहर के लोगों को यह फ़िल्म उतनी पसन्द नहीं आएगी 
फ़िल्म की कहानी का केंद्रीय बिंदु है “लकी कॉफी कैफ़े” , जिसकी मालकिन दिलशाद ईरानी ( डिंपल कपाड़िया ) रहती है । फ़िल्म के सभी किरदार एक - एक कर के उस कॉफ़ी कैफ़े में टकराते है , और कहानी आगे बढ़ती रहती है । छोटे शहरों में कैफ़े के जगह “टपरी” होती है । वैसे यह कहानी की पृष्ठभूमि मुम्बई की है । तो महानगरों के लोग कैफ़े जैसी जगहों पर जा कर कुछ पल चैन के गुजारते हैं । फ़िल्म में नाना पाटेकर ने एक ऐसे इंसान का अभिनय किया है , जो अपने जीवन में अकेला है । पर धीरे - धीरे उस कॉफी कैफ़े में जाने के बाद उसके अंदर का सख्त इंसान भी पिघलता है । यह चीज़ दर्शकों को पसंद आएगी ।
कहानी में ट्विस्ट तब आता है , जब उस कॉफ़ी कैफ़े के असली मालिकाना हक की बात आती है । क्योंकि एक मल्टी नेशनल कॉम्पनी उस कॉफी कैफ़े को खरीदना चाहती है ।
फ़िल्म में नाना पाटेकर और डिंपल कपाड़िया के बीच फिल्माए गए दृश्यों पर चेहरे पर मुस्कान लाती है । एक ऐसी दोस्ती उम्र के उस पड़ाव पर फ़िल्म में देख कर अच्छा लगता है ।
कुछ और भी किरदार इस फ़िल्म में है , जिनका काम केवल फ़िल्म को आगे बढ़ाने के लिए औऱ गीत - संगीत के लिए है ।
निर्देशन मैं इतनी जान नहीं थी । काफी जल्दी - जल्दी दृश्य को समेटने की कोशिश की गई है । यह पूरी फ़िल्म को अगर आप किसी उपन्यास में पढ़ियेगा तो ज्यादा सकून मिलेगा , क्योंकि उपन्यास में दृश्य इतने जल्दी - जल्दी नहीं भागते हैं ।
कुल मिला के फ़िल्म ऐवरेज है । आप इसे टाइमपास के लिए देख सकते है ।
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मैं इस फ़िल्म 3.5 स्टार दूँगा । असली में यह फ़िल्म 3 स्टार के लायक है , लेकिन नाना पाटेकर अपने दृश्यों में दिल लूट जाते है ।।
समीक्षक - अभिलाष दत्ता   
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वजूद

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साल 2018 के तीसरे शनिवार 20 जनवरी को , “पाटलिपुत्र सिने सोसाइटी” के तरफ से “विश्व संवाद केंद्र” , फ्रेजर रोड पटना में , शाम 3 बजे से फ़िल्म “वजूद” का प्रसारण किया गया ।
1998 में आई “एन. चंद्रा” की लिखित एवं निर्देशन में बनी फ़िल्म “वजूद” में , मुख्य कलाकार नाना पाटेकर , माधुरी दीक्षित , मुकुल देव , रम्या कृष्णन थीं । 

फ़िल्म के बारे में बात शुरू करने से पहले , इस फ़िल्म के निर्देशन और स्क्रिप्ट पर बात करते है । इस तरह की रचना को लिखना और उसे अपने मन में चित्रों के माध्यम से तैयार करना । अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है । इस जगह पर , निर्देशक “एन. चंद्रा” सफल साबित हुए हैं ।
फ़िल्म में इतने सारे पहलू है की किसी एक पहलू को लेकर बात करना , फ़िल्म के साथ नाइंसाफी होगी । फिर भी हम नाना पाटेकर के पहलू को लेकर बात करते है । क्योंकि पूरी फ़िल्म उनके इर्द - गिर्द ही घूमती दिखती हैं । साहित्य और रंगमंच के जीवन में एक छिपा हुआ काला पक्ष होता है । ऐसे बहुत से लेखक हुए या रंगमंच के सितारे हुए जो अपने पात्रों को जीने के लिए किसी भी हद तक गए । औऱ जब हद परकाष्ठा पर पहुँच जाती है तो वह इंसान , इस समाज के बनाये नियमों से ऊपर उठ जाता है । हमारा समाज उसे मुजरिम समझ लेता है । और समझना भी चाइए , क्योंकि “मल्हार” ( नाना पाटेकर) एक थिएटर का डायरेक्टर जो अपने किरदार में इतना घुस चुका रहता है , उसे असलियत का ज्ञान खत्म हो जाता है । वह नाटक रचते - रचते खुद को ब्रह्मा समझने लगता है । और जब इंसान के बीच मे रहने वाला में से कोई एक खुद को ब्रह्मा होने का दावा करने लगे तो उसका अंतिम ठिकाना जेल होता है ।
जेल से निकलने के बाद वह अपने आप को तिरष्कृत नज़रो से देखने लगता है । वह इस पूरे शहर से बदला लेना चाहता है । अब यह पूरा शहर उसके लिए रंगमंच है । अब वह यहाँ तरह - तरह के नाटक कर के शहर के प्रशासन को परेशान कर के रख देगा । पूरा शहर अब उसके नाटक का हिस्सा हो चुका है । पूरे शहर को अब वह अपने निर्देशन पर अभिनय करने पर मजबूर कर रहा है ।
इस फ़िल्म को आप और चार पहलुओं के आधार पर देख सकते है । अपूर्वा ( माधुरी दीक्षित ) के नज़र से , इंस्पेक्टर निहाल ( मुकुल देव ) , सोफिया ( रम्या कृष्णन) और अंतिम पहलू मल्हार के बाप के पहलू के हिसाब से ।
हमें यह फ़िल्म क्यों देखनी चाइए ?
इसका केवल एक ही जवाब है , “नाना पाटेकर” । उनकी एक्टिंग और संवाद अदायगी का कोई जोड़ नहीं है । पागल बच्चे का पात्र का अभिनय कर के , नाना पाटेकर एक्टिंग के उस ऊंचाई पर जाते हुए दिखते है । मल्हार की एक्टिंग अगर आपने नही देखी , तो आप बहुत कुछ मिस करेंगे । “मेथड एक्टिंग” करने वाले या यह सीखने वालों के लिए यह सिर्फ एक पात्र नहीं , पूरी की पूरी अपने आप में “यूनिवर्सिटी” है ।
कुछ चीज़ें जो अंतिम में परेशान करती है । शापित देवता नामक नाटक का अंतिम में राज़ खुलना । पूरी फ़िल्म में मल्हार के द्वारा अपने हाथों की उंगलियों को बजाते रहना । मल्हार का यह कहना , “हम सब अस्वाथमा है” । और इसी फ़िल्म में यह कहना “मैं ही ब्रह्मा हूँ” , विरोधाभाष की स्तिथी उत्पन्न करती है ।
बाप द्वारा पूरे मोहल्ले में जलील करता हुआ दृश्य , एक कलाकार की नज़रों से देखने पर , आपको गुस्से वाली भावना में ला सकती हैं । फ़िल्म का अंत , अपने आप में “मास्टरपीस” है ।
यह फ़िल्म केवल एक बार देखने लायक फिल्मों वाली नहीं है । फिल्मों के शौकीन रखने वाले इस फ़िल्म को बार - बार जरूर देखना चाहेंगे ।
समीक्षक :- अभिलाष दत्ता

अनुभव में मेरा लिखा संपादकीय

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मनुष्य रूपी जीवन सतत सीखने की प्रक्रिया है । जिस पल हमारे अंदर से सीखने की ललक खत्म हो जाती है । उसी पल से यह मनुष्य जीवन “अर्थहीन” हो जाता हैं ।
हम वर्तमान में जीते हैं । वर्तमान सही अर्थ में बस एक क्षण भर होता है । दूसरे ही क्षण में वह भूतकाल में तब्दील हो जाता है । और भूतकाल में घटित घटना से ही हम सीखते हैं , और इसी को अनुभव कहते हैं ।
पिछले दिनों व्हाट्सएप्प पर एक बड़ा अच्छा सा संदेश प्राप्त हुआ था । वह कुछ इस प्रकार का था ...
“ सफलता की कहानियाँ मत पढ़ो उससे आपको केवल एक संदेश मिलेगा।
असफलता की कहानियाँ पढ़ो उससे आपको सफल होने के कुछ विचार मिलेंगे । ”
यह संदेश सार्थक भी लगी , थोड़ी हँसी भी आई । लिखने वाले की मनोदशा के हिसाब से हमें असफलता की कहानियाँ ज्यादा पढ़नी चाहिए । मेरी सोच में यह बिल्कुल गलत बात है । हमें दोनों तरह की कहानियाँ जरूर पढ़नी चाहिये । यह दोनों ज्ञान के स्त्रोत हैं , दोनों से हमारे जीवन में कुछ न कुछ जरूर सीखने को मिलेगी ।
सफलता या असफलता जीवन का दूसरा पहलू । वह एक अलग विचार - विमर्श का विषय है । पर इस कारण से हम सफलता की कहानी पढ़ना छोड़ दे , यह अनुचित होगा । कुछ न कुछ सीखने को हमें सभी जगह से मिलता है ।
आज एक शिशु , पहली बार चलना सिख रहा है । चलने के दौरान वह हज़ारो बार गिरेगा । पर वह फिर भी चलना नहीं छोड़ेगा , न ही उसके घर के लोग उसको चलने से रोकेंगे । ठीक उसी तरह ,जीवन में हमारे सामने अनेक कठिनाई जरूर आएगी । हम उसका सामना करेंगे , इससे हमारा अनुभव और मजबूत होगा । यह सीखने की प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहती है ।
आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है , इस पत्रिका का नाम हमारी समूह ने “अनुभव” रखने का निश्चय किया है । समूह के सभी सदस्यों का मानना है , हम इस कार्य से कुछ न कुछ जरूर सीखेंगे ।
तो आप सभी इस पत्रिका को देखिए - पढ़िए। यह आपके ज्ञान वृद्धि का काम करेगा । ज्ञान वृद्धि का ही पर्यायवाची शब्द अनुभव होता है ।
आपका अपना
अभिलाष कु० दत्त
( संपादक )

इंग्लिश विंग्लिश

मार्च के दूसरे शनिवार 10.03.2018 को , विश्व संवाद केंद्र पटना ,बिहार में “पाटलिपुत्र सिने सोसाइटी” की तरफ से दिवगंत श्रीदेवी जी को श्रद्धांजलि देते हुए , फ़िल्म “इंग्लिश विंग्लिश” का प्रसारण किया गया । यह फ़िल्म वर्ष 2012 को 5 अक्टूबर को रिलीज़ हुई थी । इस फ़िल्म के जरिये श्रीदेवी जी ने अपनी फिल्मी पारी का आगाज़ दुबारा शुरू किया था । पंद्रह साल के बाद पर्दे पर आना और बस छा जाना यह कला सिर्फ श्रीदेवी को ही आता था ।
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फ़िल्म को निर्देशित किया है गौरी शंकर ने । एक ऐसी फ़िल्म जिसे देखते वक़्त आपका दिमाग भारी नहीं लगेगा । एक हल्की - फुल्की फ़िल्म अपने दर्शकों को बाँध कर रखने में सफल हुई है । और इसे सफल बनाया है श्रीदेवी जी ने अपने उत्कृष्ट अभिनय के बदौलत । फ़िल्म में जो मुद्दा उठाया गया है , वह आज के समय में बहुत बड़ा मुद्दा है । हम भाषा के लिए बने है , या भाषा हमारे लिए बना है ?
अगर आज के दौर में खासकर भारत में आपको अगर इंग्लिश ( अंग्रेजी ) नहीं आती , तो आप बेकार है । इसी चीज़ को एक गृहणी के नज़रिए से दिखाया गया है । जिसे सिर्फ इंग्लिश न बोल पाने के कारण अपने बच्चों से भी जलील होना पड़ता है । उन सभी व्यक्तियों का घुटन इस फ़िल्म में श्रीदेवी ( शशि ) के उस संवाद से पता चलता है , जब वह कहती हैं - सभी इम्पोर्टेन्ट बातें तो इंग्लिश में ही होती है ।
सेकंड हाफ में फ़िल्म सकारात्मकता की और बढ़ती हुई दिखाई देती है । इंग्लिश की ट्यूशन क्लास के दिखाए गए दृश्य आपको अपने किसी ट्यूशन क्लास की याद जरूर दिला देगी । वह फ्रेंच लड़के का शशि के तरफ आकर्षित हो जाना , कहीं से भी आपको यह नहीं लगेगा यह गलत हो रहा है । वह दोस्ती की ऐसी भावना है जिसे परिभाषित नहीं की जा सकती ।
बॉलीवुड फिल्मों में क्लाइमेक्स से पहले एक एन्टी क्लाइमेक्स दृश्य जरूर होते है । इस फ़िल्म शशि के हाथों लड्डू की ताली का गिरना वही एन्टी क्लाइमेक्स दृश्य है ।
सबसे मजेदार वह दृश्य है , जब वह फ्रेंच लड़का फ्रेंच भाषा में औऱ शशि हिंदी में बात करती है । यहाँ एक चीज़ समझने के लिए है , जब दिल की बात समझनी हो तो वहाँ भाषा की दीवार मायने नहीं रखती है ।
अमिताभ बच्चन जी का गेस्ट अपेरेंस है । वह अपने दृश्यों में काफी अच्छे हैं ।
यह फ़िल्म क्यों देखनी चाइए ?
पहला , श्रीदेवी के अभिनय के लिए ।
दूसरा , अमेरिका में एक इंग्लिश न बोल पाने वाले व्यक्ति के दर्द को अपने में महसूस करने के लिए ।
तीसरा , अपने भाषा पर गर्व करने के लिए ।
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मेरे तरफ से फ़िल्म को 4 स्टार
समीक्षक - अभिलाष दत्ता

बेचैन बंदर ( पुस्तक समीक्षा )


जिस दिन यह किताब मेरे यहाँ dtdc के डिलीवरी वाले ने ला कर दी , उस वक़्त मैं मोबाइल में “दिल्ली बेल्ली" नामक फ़िल्म देख रहा था । फ़िल्म में वह दृश्य चल रहा था जब फ़िल्म का खलनायक “विजय राज" नकली पार्सल का डिब्बा खोल कर अपने सामने रखता है । मैं भी किताब का पार्सल खोल चुका था ।
तभी फ़िल्म के दूसरे दृश्य में खलनायक का साथी बोलता है - “भाई यह तो टट्टी है” ....


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यह दृश्य फ़िल्म के लिए बनी थी , पर संजोग देखिए यह बात उस समय मेरे लिए भी उतनी ही उचित थी , जितनी विजय राज जी के लिए । सही मायने में किताब टट्टी है ।
मैं कभी कोई किताब की बुराई नही करता हूँ , क्योंकि एक किताब लिखने में कितनी मेहनत लगती है यह मुझे पता है । इसलिए यहाँ किताब की आलोचना नहीं होगी , यहाँ लेख़क की आलोचना होगी । दुनिया के महान लेख़क , स्टीफन हाकिंग के गुरु श्री श्री “विजय सिंह ठाकुराय” । पड़ गए न चक्कर में , यह उनका छद्म नाम है । यह नाम कहाँ से आया है सबको पता है । किताब पर कुछ और ही नाम है , “विजय राज शर्मा” उर्फ झकझांकिया । लेख़क महोदय ने जो मार्केटिंग की उसके लिए वह सही में बधाई के पात्र है । अकेला आदमी पूरे भारत के अच्छे से अच्छे लेखको और पाठकों की आँखों मे धूल झोंकने में सफल रहा । सफलता का अंदाज़ा इसी से लगा के देखिए , 5000 प्रतियां खुद के दम पर छपवाना और अपना पूरा का पूरा कचरा बेच देना , यह सही में काबिलेतारीफ है ।
भारत में लोगों को दिग्भ्रमित करना हो तो सबसे आसान तरीका है , उस वस्तु का दाम आसमान पर रख दो । 248 पेज की किताब का दाम 650 रुपुए । लेने के बाद आप खुद को ठगा हुआ महसूस कीजियेगा । पूरे सेट में केवल वह कलम ही आकर्षित करते नज़र आती है ।
यह किताब क्यों न पढ़े :-
क्योंकि हमने 11th - 12th में विज्ञान पढ़ा है । अगर आप इसे हिंदी भाषा का साइंस फिक्शन समझने की भूल में है तो आप मेरी तरह ठगी के शिकार होने के लिए तैयार रहिये । यह कुल मिला कर विज्ञान की किताब हिंदी में लिखी है और कुछ नहीं ।
किताब स्टार देने के लायक भी नहीं है ।


अभिलाष दत्ता

छँटते हुए चावल ( पुस्तक समीक्षा )

जब खुद के जीवन के अनुभव कड़वे होते हैं । तब कलम में ताकत खुद-ब-खुद आ जाती है । इस कथन को पूर्ण रूप से चरित्रार्थ , नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ जी की किताब “छँटते हुए चावल” करती दिखाई देती है ।
स्त्री विमर्श पर उनके द्वारा लिखी गयी यह किताब , आज के मध्यम वर्गीय एवं निम्वर्गीय औरतों का परिचय करवाती नज़र आती है ।
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किताब की पहली कहानी “छँटते हुए चावल” में उन्होंने चॉल में रहने वाले लोगों , खासकर औरतों के जीवन को अच्छे ढँग से उतारा है । कहानी के माध्यम से उन्होंने यह बताया है की औरतों के समूह में एक नेता ( नेतृत्व ) होती है । पूरे चॉल की महिला उसके आगे पीछे लगी रहती है । कहानी के अंत में सरिता के द्वारा कहे गए संवाद में “पति के जाने के बाद हम औरतों के पास कोई काम नहीं होता है । तो चावल छाँटते वक़्त किसी की बुराई कर लेते हैं” । इस पंक्ति में कहानी का सार नज़र आ जाता है । सरिता औरतों की सच्चाई भी बता देती है , और साथ में यह भी बता देती हैं कि इस काम में उसे और बाकी औरतों को रस की प्राप्ति होती है ।
किताब की बात करूँ , तो इस कहानी संग्रह में चौदह कहानी आपको पढ़ने को मिलेगी । अधिकतर कहानी सुखद अंत का एहसास कराते ख़त्म होती है । कुछ ही कहानी दुःखद अंत के साथ ख़त्म हुई है ।
“बिछावन” कहानी का अंत आपको झकझोर कर के रख देगी । लेकिन फिर कहानी “काला अध्याय” में लेखिका दोहरावपन का शिकार होती दिखती है । ऐसी कहानी बहुत लेख़क पहले भी लिख चुके हैं ।
पर जैसे ही आप कहानी “आस भरा इंतज़ार” की ओर बढिएगा , आपको एक दफा , यकीन मानिए “प्रेमचंद" जी की याद जरूर आ जायेगी । लीला के मन में पूरी और रोटी का जो अंतर्द्वंद्व चल रहा था , वह सही मायने में अमीरी गरीबी के खाई को दिखाती है ।
क्षेत्रीयता का प्रभाव भी किताब में नज़र आता है । “माफ करना” कहानी में छठ पूजा के दृश्य बड़े मनोरम तरीके से लिखे गए हैं । लोकभाषा के कुछ शब्दों के इस्तेमाल से कहानी में जान और बढ़ गयी है । पाठक इस चीज़ से और अच्छे तरीके से जुड़ पाएंगे ।
कहानियाँ पढ़ते वक्त आपको यह एहसास होगा की यह सभी पात्र हमारे आस - पास ही हैं । पर हमें नज़र क्यों नहीं आते ? क्योंकि हमारे पास एक लेखक वाली नज़र नहीं होती ।
किताब को मैं 5 में से 4 स्टार दूँगा । 
1 स्टार इसलिए काटूँगा की आज हर दूसरा लेख़क स्त्री विमर्श के मुद्दे पर लिख रहा है । तो अब इन मुद्दों पर लिखी कहानियाँ पहले से पढ़ी हुई लगने लगती है ।
एक विनती और कहानी पढ़ने से पहले , इस किताब में लिखी “आत्म संवाद” अवश्य पढ़िए । किताब से और अच्छे तरीके से आप जुड़ सकेंगे ।

धन्यवाद ,

आपका 
अभिलाष दत्ता

पटना में प्यार

                       पटना में प्यार
सुन मेरे हमसफ़र
क्या तुझे इतनी सी भी खबरसुन मेरे हमसफ़र
क्या तुझे इतनी सी भी खबर
की तेरी साँसे चलती जिधर
रहूँगा बस वही उम्र भर
रहूँगा बस वही उम्र भर हायजितनी हसीं ये मुलाकातें हैं
उनसे भी प्यारी तेरी बातें हैं
बातों में तेरी जो खो जाते हैं
आऊँ ना होश में मैं कभी
बाहों में है तेरी ज़िन्दगी हाय
सुन मेरे हमसफ़र”.......
.............
देखों आज मौसम कितना खुशनुमा है । ऑफीस के लिए निकल रहा हूँ । हल्की बूंदाबांदी भी हो रही है । मोबाइल पर तुम्हारी मनपसन्द गीत चल रही है । इयरफोन को अपने कान लगा कर इस गीत को महसूस कर सकूँ । मुझे पता है तुम्हें यह बिल्कुल पसंद नही है कि बाइक चलाते वक़्त इयरफोन पर गाने सुनु । पर क्या करूँ ... तुम तो साथ में हो नहीं , तुम्हारी याद तो साथ में है । इयरफोन पूरी तरह एक दूसरे में उलझा हुआ है । ठीक उसी तरह हम दोनों एक दूसरे में उलझ कर रह गए है । इयरफोन को बिना सुलझाए उसकी उपयोगिता न के बराबर है । वैसे हम भी एक दूसरे में उलझे हुए अलग - अलग राहों पर चल चुके हैं । परेशान हूँ , कहीं गीत के खत्म होने से पहले इयरफोन के तारों को न सुलझा पाया तो ?
इयरफोन तो सुलझ गयी है । इस गाने को लूप मोड पर दुबारा से बजा दिया । देखो आज ये गांधी मैदान वाला रास्ता कितना खाली है । पटना की सड़के खाली देखना जन्नत देखने के बराबर जैसा है । ओह , मुझे तो अभी याद आया आज कथित तौर पर भारत बंद है । स्वर्णों ने आज भारत बंद कर दिया है । चलो इसी बहाने सड़के खाली है । प्रेस लिखी हुई बाइक को जल्दी कोई रोकता नहीं है । मोबाइल पर अब यही गीत एक बार फिर शुरू हो चुकी है । याद तो तुम्हें होगा ही अंतिम बार तुम मेरे बाइक पर कब बैठी थी । 1.5 साल पहले , उसी दिन तुमने यह गाना मुझे पहली बार सुनाया था । पूरे चेहरे को तुमने अपने दुपट्टे से ढक लिया था । तुम्हारे मन में डर था कि कोई जान पहचान का देख न ले । डर तो मुझे भी था इसलिए पूरे रास्ते भर मैंने अपना हेलमेट नहीं उतारा था । पटना में प्यार करना बहुत डरावने सपने जैसा होता है । हर पल ऐसे लगते रहता है कि कोई देख रहा है । इस डर की वजह से पटना के सभी रास्ते हम उस दौर में नाप चुके थे । जब आप प्यार में होते है तो हमेशा नए रास्ते या नयी जगह की तलाश में होते है , क्योंकि एक जगह पर दो तीन दिन तक मिलना वहाँ के लोगों की नज़रों में खटकने लगता है । फिर पटना के नियम को सार्थक मान कर हम दोनों भी पटना के चिड़ियाघर गए थे । पटना के सभी आशिक़ अपने प्यार में दौर में इस जगह जरूर आता है । यह प्यार करने वालों के लिए मंदिर है । पर इस मंदिर में भी पापी लोग आते है । वह चार लड़के मुझे आज भी याद है जो कैसे ख़राब नज़रो से हमे देख रहे थे । वह तो बेशर्म थे , हमें ही अपना मंदिर छोड़ कर जाना पड़ा । पटना में हर नज़रे आपका पीछा करते रहती हैं ।
तुमने कहा था कि तुम्हें वरुण धवन बहुत पसंद है । मुझे भी तुममें आलिया भट्ट नज़र आने लगी थी । फ़िल्म का नायक तो अपनी दुल्हनिया तो ले आता है । पर क्या पटना का हीरो अपनी हीरोइन को अपना बना पाता ?
शायद नहीं ,, तुम्हें भविष्य की चिंता होने लगी थी । तुम्हें अपने घर में बेटे होने की जिम्मेदारी भी निभानी थी । और , मुझे तो लेख़क बनने का भूत सवार हो गया था । यह नौकरी पाने की होड़ में हम दोनों अब दूर हो रहे थे । पर मैं तुमसे दूर नही रह सकता था । इसलिए मैंने भी कैरियर प्लानर में तुम्हारे बैच में एडमिशन ले लिया । 6 महीना के अंदर ही मुझे पता लग गया कि यह सरकारी नौकरी का नौटँकी हमसे नहीं हो पायेगा । पर तुम तो हर टेस्ट में टॉप हुए जा रही थी । तुम बैंक पी.ओ का सपना देख रही थी , और मैं बेस्टसेलर बनने का । मुझे भी पता था हम दोनों अलग - अलग जाति के थे । चलो एक पल के लिए मान लेते है , की मैं तुम्हारे घर आ कर तुम्हारे पापा से बात करूँ । नौकरी के नाम पर मैं क्या कहूँगा कि मैं एक लेख़क हूँ और छोटा मोटा पत्रकार । यहीं से हमारे रास्ते अलग हो चुके थे । हम दोनों में ईगो की मात्रा भरपूर थी । जब तुम्हारा बैंक पी.ओ का एग्जाम क्लियर हुआ और तुम्हारी नौकरी भोपाल में लगी तो तुमनें मुझे बताना भी जरूरी नही समझा । तुम्हारी शर्त थी कि मुझे भी सरकारी नौकरी करनी होगी तो वह अपने घर वालों को शादी के लिए मना लेगी ।
लेकिन तुम्हें पता तो था , कि मुझसे सरकारी नौकरी की तैयारी नहीं हो सकती थी ।
.....
खैर छोड़ो , मेरा ऑफिस आ चुका है । कभी दुबारा मिलो एक बार फिर बाइक पर कहीं घूमने निकलते हैं । NIT , महेंद्रू , खाजेकलां कहीं भी ।
और यह गीत यह तो बजती ही रहेगी ।।
“सुन मेरे हमसफर , क्या तुझे इतनी सी है ख़बर”...



अभिलाष दत्ता